मुंबई. बॉलीवुड में महात्मा गांधी फॉर्मूला कारगर साबित होता नजर आ रहा है। पिछले तीन सालों में चार फिल्में आ चुकी हैं जो गांधीवाद या महात्मा से प्रेरित हैं। काबिले-गौर यह है कि इन चारों ही फिल्मों को सफलता मिली है। अगर बॉक्स ऑफिस पर नहीं तो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सिने-आलोचकों की सराहना के रूप में ही सही।
इतिहास पर नजर डालें तो आजादी के बाद हिंदोस्तान में सिनेमा का क्रेज बढ़ने लगा था और 60 के दशक के बाद फिल्मों की लोकप्रियता में क्रांति आ गई। धार्मिक गाथाओं से निकलकर ऐतिहासिक चरित्रों जैसे सिकंदर, अकबर, मीरा पर फिल्में बनीं लेकिन भारतीय फिल्मकारों को महात्मा गांधी जैसे चरित्रों की याद नहीं आई। 1968 में गांधी को याद करने की महत्वपूर्ण कोशिश में भारत सरकार के फिल्म विभाग ने जरूर एक वृत्तचित्र बनाया लेकिन लोगों तक इसकी पहुंच न के बराबर ही रही।
फिर, 1982 में रिचर्ड एटनबरो ने गांधी के जीवन पर फिल्म बनाकर न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान इस प्रासंगिक चरित्र की ओर खींचा। उसके बाद धीरे-धीरे बॉलीवुड में स्वतंत्रता संग्राम के नायकों पर फिल्में बनाने का सिलसिला शुरू हुआ और 1994 में आई सरदार। टेलीविजन पर 53 एपिसोड का बेहतरीन धारावाहिक भारत एक खोज बनाने वाले श्याम बेनेगल ने 1996 में द मेकिंग ऑफ द महात्मा बनाई।
इसके कुछ अरसे बाद फिर एक लहर उठी और वर्ष 2000 मे कमल हासन ने हे राम बनाकर आलोचकों की भरपूर तारीफ लूटी। हे राम के बाद फिर एक सन्नाटा छाया और पांच साल बाद टूटा तो ऐसे कि गांधी पर एक के बाद एक फिल्में आने लगीं।
लेकिन, इसके बीच महत्वपूर्ण यह है कि गांधीवाद या गांधीगिरी हमेशा प्रासंगिक रहने के बावजूद क्षणिक तौर पर परवान चढ़ती है और फिर लोग रोजमर्रा के जीवन की शैली बताने वाले इन विचारों को भूल जाते हैं।
पहले भी हुए थे अंतरराष्ट्रीय प्रयास :
गांधी के जीवन पर आधारित एक फिल्म के निर्माण के लिए 1952 में गैब्रियल पास्कल ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ एक एग्रीमेंट किया था लेकिन फिल्म की तैयारी होने से पहले ही पास्कल 1954 में गुजर गए। इसके बाद गांधी पर फिल्म बनाने के लिए डेविड लीन और सैम स्पीगल ने रुचि दिखाई और गांधी के किरदार के लिए एलेक गिनीज का नाम भी तय हो गया लेकिन लॉरेंस ऑफ अरेबिया के निर्माण को प्राथमिकता देते हुए यह प्रोजेक्ट रद्द कर दिया गया।