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सस्ते कर्ज के जाल में मध्य वर्ग

अभिमत. परंपरागत अर्थव्यवस्था में पैसा उधार देने वाले लालची सूदखोरों की भूमिका आम रही है। मौजूदा दौर में लगता है कि बैंकों के जरिए संस्थागत उधारों के पुराने दु:स्वप्न को एक नया रूप मिल गया है। सुधारों के इस युग में रिटेल बैंकिंग का एक सकारात्मक पहलू यह है कि अब उधार कहीं आसानी से मिलने लगा है।

लेकिन हमें इसके नकारात्मक पहलुओं पर भी गौर करना होगा। बैंकों ने आजकल लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए बाजार में क्रेडिट कार्डस और ऋण के दूसरे सरल उपायों की बाढ़ ला दी है। स्मार्ट उपभोक्ता ने तो इनका इस्तेमाल सुविधा के लिहाज से किया, लेकिन ज्यादातर लोग आसानी से उपलब्ध उधार की बाढ़ में बह गए।

आर्थिक उदारीकरण से लाभ उठाने वाला देश का ‘नया मध्य वर्ग’ इस जाल में फंस गया है। कई निजी बैंकों ने ऋणों की वसूली के लिए जो तौर-तरीके अपनाए, उससे परिस्थितियां और बिगड़ गईं। इन बैंकों ने मौखिक और शारीरिक रूप से डिफॉल्टर्स को डराया-धमकाया। बैंकों के एजेंटों द्वारा सार्वजनिक रूप से बेइज्जत किए जाने की वजह से कर्जदार आत्महत्या तक करने लगे हैं।

कई बार उच्च अदालतों ने इसका संज्ञान लिया है और अब तो सुप्रीम कोर्ट को भी बैंको को ऐसा करने से रोकने के लिए आगे आना पड़ा है। अदालतों ने यह साफ कर दिया है कि बैंक बकाया ऋण की वसूली के लिए किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकते।

अब समय आ गया है कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ऐसे बैंकों को दंडित करने के लिए नियम-कायदे बनाएं, जो कानून अपने हाथ में लेते हैं। इसका हरगिज यह मतलब नहीं है कि कर्जदारों का बैंक से किए गए वादों को पूरा करने का नैतिक व कानूनी तौर पर दायित्व नहीं बनता।

लेकिन बैंकों को भी ऋणों की वसूली के लिए प्रभावी कानूनी तौर-तरीके खोजने होंगे। बैंकों को न सिर्फ ग्राहकों की आर्थिक दशा और ऋण चुकाने की क्षमता को जांचना चाहिए वरन डिफाल्टरों को भी संवेदनशील तरीके से साधना चाहिए।





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