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जय जवान-जय किसान का संदेशवाहक

आलेख. देश के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री सामान्य जनता की भावनाओं, सपनों और आकांक्षाओं के सर्वोत्तम प्रतीक थे, जिनके मन में किसानों और जवानों के प्रति हार्दिक ममता थी। जब गांधीजी ने शांतिपूर्ण अवज्ञा का आंदोलन सन १९२0 में चलाया और अंग्रेजी शिक्षा, अंग्रेजी वेशभूषा और अंग्रेजी न्यायालयों के बायकाट का आह्वान किया, तो शास्त्रीजी ने कॉलेज की शिक्षा को छोड़ दिया।

सन १९३२ में अंग्रेजी दमन के चलते जेल यात्रा के बाद शास्त्रीजी पूर्णत: पूरे समय के लिए आजादी के सिपाही बन गए। उत्तरप्रदेश में वे कांग्रेस के प्रमुख संगठन कार्यकर्ताओं में से थे। इसी दौरान कार्य में लगन और परिश्रम, विनम्र स्वभाव और उत्सर्ग भावना के गुणों ने उन्हें जवाहरलाल नेहरू व श्री गोविंदवल्लभ पंत का प्रिय बना दिया।

सन १९४क् के व्यक्तिगत सत्याग्रह और सन १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में वे फिर बंदी बना लिए गए। सन १९४२ से सन १९४५ तक वे जेल में ही रहे। सन १९४६ में उत्तरप्रदेश की विधानसभा में चुनाव जीते और कांग्रेस प्रशासन में संसदीय सचिव बने। इस पद पर वे मुख्यमंत्री पंत के सहयोगी थे। बाद में राज्य सरकार के पुलिस मंत्री बने। तीसरे संसदीय आम चुनाव में वे लोकसभा के सदस्य बन गए।

पहले तो वे केंद्रीय गृहमंत्री पंत के सहयोगी राज्यमंत्री बने, परंतु उनके निधन के बाद उन्हें ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियां दी गई। तीसरा आम चुनाव (सन १९६२) जीतकर वे केंद्र सरकार में रेल मंत्री बन गए। परंतु, जब सन १९६३ में एक बड़ी रेल दुर्घटना हो गई तो उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी के चलते मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। प्रधानमंत्री नेहरू को उनकी कमी खलने लगी।

पं. नेहरू तब तक वृद्ध भी हो गए थे और उन्हें रोगों ने भी घेर लिया था। चीनी आक्रमण के बाद कुछ टूट भी गए थे। तब कांग्रेस पार्टी को प्रवीण संगठनकर्ताओं की भी विशेष जरूरत थी और पं. नेहरू के उत्तराधिकारी को तैयार करने का भी प्रमुख सवाल था। मंत्रिमंडल के अंदर इसी समस्या के चलते वरिष्ठ मंत्रियों में चुपके-चुपके खींचतान भी चल रही थी।

कुछ घटनाओं के चलते पं. नेहरू के दो घनिष्ठ सहयोगी मंत्री रक्षामंत्री कृष्ण मेनन और कृष्णदेव मालवीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे चुके थे। वे वामपंथी रुझान के थे। उनके जाने के बाद मंत्रिमंडल में कुछ असंतुलन भी बढ़ गया था।

कांग्रेस अध्यक्ष कामराज नाडार, जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके थे, ने तब एक योजना तैयार की और प्रधानमंत्री नेहरू को सलाह दी कि वे कुछ वरिष्ठ मंत्रियों से त्यागपत्र देने का आग्रह करें। इस कामराज योजना के तहत एसके पाटिल, मोरारजी देसाई आदि मंत्रिमंडल से हट गए।

चार वरिष्ठ मंत्रियों के हटने की मजबूरी और पं. नेहरू के गिरते स्वास्थ्य ने कांग्रेस अध्यक्ष व प्रधानमंत्री दोनों को बाध्य कर दिया कि वे शास्त्रीजी को मंत्रिमंडल में पुन: शामिल करें। उन्हें मूलत: प्रधानमंत्री के साथ रहकर उनका भार हलका करने की जिम्मेदारी दी गई और इसीलिए वे बिना विभाग के मंत्री बनाए गए।

मई,१९६४ में जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया। खींचतान के अनिश्चित माहौल में पार्टी व सरकार को सबल स्थायित्व देने के लिए कांग्रेस संसदीय दल ने शास्त्रीजी को नेता चुना और वे प्रधानमंत्री बन गए। छोटे से गांव के एक सामान्य परिवार के एक लाल को देश का उच्चतम कार्यकारी पद मिला।

शास्त्रीजी पर महंगाई रोकने, राष्ट्रीय सीमाओं को ज्यादा सुरक्षित बनाने और देश का आत्मबल बढ़ाने की जिम्मेदारियां थीं। उधर, पाकिस्तान के सैनिक प्रशासक अयूब खां ने अनिश्चित हालात, चीन से भारत को मिली पराजय आदि के चलते भारत पर आक्रमण कर दिया।

शास्त्रीजी को अयूब ने एक कमजोर प्रशासक समझकर अचानक हमला बोला था, परंतु शास्त्रीजी दिलेर और इरादे के पक्के थे। उनकी सूझबूझ और सेनाओं के शौर्य के चलते भारत दबा नहीं और पाकिस्तान की बहुत सी धरती पर उसने कब्जा कर लिया।

तब सोवियत संघ के प्रमुख नेता ब्रेजनेव ने अयूब और शास्त्रीजी को ताशकंद आने का निमंत्रण दिया। दोनों के बीच ताशकंद में बातचीत के सफल होने पर शांति स्थापित हुई और युद्ध भारत की जीत से समाप्त हुआ। देशभर में शास्त्रीजी की नेतृत्व क्षमता सराही गई।

परंतु उस वर्ष देश में अकाल भी पड़ा। अत: इन दो चुनौतियों - युद्ध और दुर्भिक्ष के समाधान के लिए उन्होंने जवानों और किसानों की जय का संदेश दिया, जो जय जवान- जय किसान के रूप में आज भी लोगों की जुबान पर है और शास्त्रीजी के यशस्वी प्रधानमंत्रित्वकाल की याद दिलाता है।

-लेखक वरिष्ठ समाजवादी चिंतक हैं।





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