दृष्टिकोण. हम महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहते हैं, लेकिन उनके जन्मदिन या पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करने व श्रद्धांजलि देने की रस्म अदायगी के बाद उनकी बातों, उनके आदर्शो, उनके आचरण और उनकी सीख को भूल जाते हैं। एक बात को तो हमने बिलकुल ही भुला दिया है वह है हिंदुत्व को लेकर उनका विचार और दर्शन, जो न सिर्फ मनुष्य मात्र को जीवन के उच्च आदर्शो तक पहुंचाता है अपितु राजनीति को भी अनुपम और जनकल्याण का माध्यम बनाता है।
इस संदर्भ में मैं आपका ध्यान डॉ. एस राधाकृष्णन और महात्मा गांधी के बीच धर्म को लेकर हुए एक संलाप की ओर आकर्षित करना चाहूंगा। राधाकृष्णन ने गांधीजी से तीन प्रश्न किए- आपका धर्म क्या है? इसका निर्वाह कैसे करते हैं? सार्वजनिक जीवन में इसे कैसे धारित करते हैं? पहले प्रश्न पर गांधीजी का उत्तर था- मेरा धर्म हिंदुत्व है, मेरे लिए तो यह प्राणीमात्र और मानवता का धर्म है और मेरी दृष्टि में सभी धर्म इसमें समाहित हैं।
दूसरे प्रश्न के संदर्भ में गांधी ने कहा- मैं इस प्रश्न को अतीत की बजाय वर्तमान में देखता हूं। मैं धर्म को सत्य व अहिंसा में निहित मानता हूं। मैं प्राय: अपने धर्म की व्याख्या सत्य के धर्म के रूप में करता हूं। यह कहने की बजाय कि ईश्वर ही सत्य है, मैं कहता हूं कि सत्य ही ईश्वर है।
तीसरे प्रश्न के उत्तर में गांधीजी ने कहा- सार्वजनिक जीवन में इस धर्म को मैं प्रतिदिन के आचरण व कार्यव्यवहार में जीता हूं। स्वयं को भूलकर जीवनभर सभी की सतत सेवा इस धर्म का सत्य है। जीवन के समुद्र में जब तक आप खुद के अस्तित्व व पहचान को समाहित नहीं कर लेते, तब तक सत्य से साक्षात्कार असंभव है। अतएव मेरे लिए समाज सेवा से बाहर निकल भागने का कोई रास्ता नहीं।
जगत में कहीं किसी हिस्से में भी इसके सिवाय कोई आनंद-अनुभूति नहीं मिल सकती। समाज सेवा जीवन के प्रत्येक आयाम से जुड़ी होनी चाहिए। जीवन की इस पद्धति में न तो कुछ नीचा है और न ही कुछ ऊंचा। कहने को हम भले ही कई हों, पर वस्तुत: हम सब एक हैं।
गांधीजी ने प्रश्नों के उत्तर को और विस्तार देते हुए कहा- मैं हिंदुत्व के अध्ययन की जितनी गहराइयों तक उतरता गया, हिंदुत्व पर उतना ही दृढ़ विश्वास होता गया। हिंदुत्व उतना ही विस्तृत और उदात्त है जितना कि ब्रrांड, इसलिए मेरे हृदय में सभी धर्मो के लिए अगाध श्रद्धा और आदर है।
गांधीजी मानवता की सेवा के लक्ष्य हेतु हिंदुत्व को उसके सत्य के स्वरूप में देखते थे। उनके लिए जीव ही शिव है- मनुष्य की सेवा ईश्वर की सेवा है। आत्मा के साथ गहराई तक जुड़ी यह सेवा भावना राजनीति में गांधीजी की भूमिका को निर्धारित करती है।
राजनीति में स्वयं की भूमिका के बारे में गांधीजी का कहना था- मेरे भीतर के राजनीतिज्ञ ने मेरे किसी भी निर्णय को कभी भी प्रभावित नहीं किया, यदि मैं राजनीति में हूं तो वह इसलिए क्योंकि मेरे चारों ओर राजनीति का घेरा उसी तरह है जैसे कि सांप की कुंडली, इससे कोई भी बाहर नहीं जा सकता। इसलिए मैं इस सांप से लड़ने के लिए विवश हूं।
गांधीजी सोचते थे कि भारत में राजनीति के सांप से लड़ने का श्रेष्ठ माध्यम हिंदुत्व की उदात्तता की ताकत हो सकती है, जो राजनीति को जनता की नि:स्वार्थ सेवा का उच्च धरातल उपलब्ध करा सकती है। सत्य, अहिंसा और वंचित लोगों की सेवा करने की उनकी मूल अवधारणा वेदांत की भावना से जुड़ी थी। उन्होंने भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अपने आचरण में इसे उतारने का यत्न किया।
स्वतंत्रता संग्राम के लिए जन आंदोलन खड़ा करने की सफलता के पीछे उनका राजनीति से अध्यात्म को जोड़ने का ही सामथ्र्य था। अपनी आत्मकथा में गांधीजी ने लिखा है कि मुझमें यह ताकत अध्यात्म के क्षेत्र में मेरे अनुभवों की वजह से प्राप्त हुई।
गांधीजी ने राजनीति में शुचिता और पवित्रता को प्रतिष्ठित किया। उनका विश्वास था कि सिद्धांतविहीन राजनीति मौत का ऐसा फंदा है जिसमें फंसकर राष्ट्र की आत्मा मर जाती है। वे अपने विश्वासों पर अंत समय तक टिके रहे और समूचे विश्व में भारत के नैतिक स्तर को हिमालयीन ऊंचाइयों पर प्रतिष्ठापित किया।
राजनीति के उद्देश्य के बारे में गांधीजी क्या सोचते थे, भारत में आज उनके विचार को उपेक्षित कर दिया गया है। आज देश की आत्मा विषमता, निजी ऐश्वर्य की चाहत, व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार, निर्मम उपभोक्तावाद, गरीब और कमजोर वर्ग की उपेक्षा और अपमान के मृत्यु-फांस से घिरी है। सिद्धांतविहीन राजनीति और अराजक प्रशासन एक दिन देश को गर्त में पहुंचा देगा।
आज हम देखते हैं कि हमारे राजनेताओं ने राजनीति के सांप से लड़ने की बजाय उसके साथ जीने की कला विकसित कर ली है। यही वजह है कि आज हमारी संसद में सौ से ज्यादा ऐसे सदस्य हैं जिनका आपराधिक रिकार्ड है, इनमें से 34 तो ऐसे हैं जिन पर हत्या, बलात्कार, फिरौती, अपहरण और भयादोहन के मामले दर्ज हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्होंने कैबिनेट में भी अपनी जगह बना ली है।
सत्ता पर काबिज होने के लिए मनी, मसल्स और माफिया, क्राइम, करप्शन और कास्ट के नए फामरूले गढ़े जा रहे हैं। देश का पढ़ा-लिखा तबका या तो इन स्थितियों से मुंह फेरे हुए है या फिर निंदक बनकर रह गया है। उपेक्षित गरीब तबका नेताओं के भड़कावे और उनकी दुरभिसंधि में फंसकर रह गया है। जाति-पांति और सामुदायिक वैमनस्य समाज में गहरे तक पैठ बना चुकी है।
ज्यादातर लोग राजनीति को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। उनका विश्वास है कि राजनेता आमतौर पर स्वार्थ के वशीभूत होकर सत्ता पाने के लिए मैकावेलियन रणनीति अपनाते हैं। राजनेता राजनीति को ‘संभव कर दिखाने की कला’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए सत्ता ही सब कुछ है, सिद्धांत और नैतिकता सब बेमतलब।
इसीलिए डॉ.जॉनसन के विचार में राजनीति निकृष्ट लोगों की अंतिम पनाहगाह है। लेकिन महात्मा गांधी भारतीय राजनीति को एक अलग दृष्टि, अलग विचार से सज्जित करना चाहते थे। वे राजनीति को ऐसा औजार बनाना चाहते थे जिसके माध्यम से राष्ट्र का, समाज का भला किया जा सके, जनता-जनार्दन की सेवा की जा सके।
-लेखक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे हैं।