सम्पादकीय. जैसे-जैसे एटमी करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार और वाम मोर्चे के संबंधों में तल्खी आती जा रही है, वैसे-वैसे सरकार मध्यावधि चुनाव की तैयारी की दिशा में अपने कदम तेज करती जा रही है। निर्माण क्षेत्र को बोनस के दायरे में लाने और बोनस पात्रता की सीमा बढ़ाए जाने के केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले इसी बात का प्रमाण हैं।
केंद्रीय श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नाडीज और सूचना व प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने यह फैसला महात्मा गांधी के जन्मदिन के ठीक पहले लिए जाने की याद दिलाकर यह भी जताने की भोंडी कोशिश की कि राष्ट्रपिता की चिंता का केंद्र रहे अंतिम आदमी की सरकार कितनी फिक्र करती है।
बोनस भुगतान के संबंध में मंत्रिमंडल के ये फैसले बेलगाम महंगाई के मद्देनजर ऊंट के मुंह में जीरा की कहावत को ही चरितार्थ करते हैं। इसके अलावा देश में कोई ऐसा प्रभावी तंत्र नहीं है जिससे निर्माण मजदूरों को बोनस भुगतान के दायरे में लाए जाने के फैसले पर अमल की निगरानी की जा सके।
महंगाई पर लगाम लगाने की कोशिशों के तहत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए कदमों से आर्थिक विकास दर पहले ही मंद पड़ चुकी है। हालांकि रोजमर्रा के उपयोग की चीजों की कीमतें जरा भी थमी नहीं हैं। भविष्य में भी ऐसी घोषणाओं का विकास दर पर और विपरीत असर पड़ना अवश्यंभावी है, पर ये घोषणाएं मतदाताओं को लुभा पाएंगी इसमें संदेह है।
इसके अलावा यह तथ्य भी किसी से छुपा नहीं है कि पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें वाम-दलों की आपत्ति और आम लोगों में संभावित विपरीत प्रतिक्रिया के मद्देनजर ही कृत्रिम रूप से थाम रखी हैं। खनिज तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हाल के महीनों में आई रिकार्ड तेजी के असर की अनदेखी नहीं की जा सकती है।
हालांकि रुपए की मजबूती के कारण तेल आयात का हमारा बिल बेलगाम नहीं हुआ है, फिर भी पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों को वर्तमान स्तर पर ज्यादा समय तक थामे नहीं रखा जा सकता है। और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में यह संभावित वृद्धि बाकी सभी घोषणाओं को बेअसर करने के लिए काफी होगी। इसलिए यूपीए के कर्ता-धर्ताओं को घोषणाओं का मकड़जाल बुनने के फेर में पड़ने की बजाय पहले से लागू योजनाओं और की जा चुकी घोषणाओं के प्रभावी अमल पर ध्यान देना चाहिए।