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Chhattisgarh
Raipur Raipur बसना. दो अक्टूबर को महात्मा गांधी को सब याद करते है। चरखे को कोई याद नहीं करता, लेकिन बसना ब्लाक के गांव चिर्राचुंवा के लोग सवा सौ साल बाद भी चरखे को नहीं भूले। यह उनका पुश्तैनी काम हो गया है। पिछले छह महीने से गांव के 115 चरखे सिर्फ इसलिए बंद हैं कि कारीगरों को रुई नहीं मिल रही। भुगतान भी महीनों से नहीं मिला है। रोजी-रोटी कमाने की समस्या पैदा हो गई है।
चिर्राचुंवा जोगीपाली पंचायत का आश्रित गांव है। यहां 5 साल के बच्चे से लेकर 95 साल के बुजुर्ग विश्वनाथ तक सभी को चरखे से सूत कातना आता है। गांव में कई किस्म के चरखे हैं। सावली चरखा भी है, जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी स्वयं करते थे। सौ घरों वाले गांव में सभी के यहां चरखे हैं। जिस परिवार में सदस्यों की संख्या ज्यादा है, वहां दो -दो चरखे हैं।
कांतिबाई, खेमराज, नैनसिंह और दरसराम ने बताया कि चरखा चलाकर धागा तैयार करने से बहुत ज्यादा कमाई नहीं होती, लेकिन लोग इस पुश्तैनी काम और चरखे से महात्मा गांधी की स्मृति की वजह से अलग नहीं होना चाहते। सूती रुई पर प्रति गुंडी (सौ मीटर धागा) 1.10 रुपए और पालिस्टर रुई पर 69 पैसा मिलता है।
बसना के खादी कार्यालय से उनको सूती धागे का 39.60 रुपए प्रति किलो और पालिस्टर धागे का 48.30 रुपए किलो की दर से पैसा मिलता है, लेकिन पिछले पांच सालों से सूत कातने वालों को खादी कार्यालय ने भुगतान ही नहीं किया है। मजदूरी का पैसा मांगने जब भी वे खादी कार्यालय जाते हैं, पैसा नहीं आया बताकर उनको उल्टे पांव लौटा दिया जाता है। 48 लोगों का 15 हजार रुपए का भुगतान बाकी है।
इन लोगों की पासबुक तक ग्राम सेवा समिति रायपुर से संबद्ध खादी कार्यालय के अफसरों ने अपने पास रख ली है। पासबुक के बिना इन लोगों को पता ही नहीं चलता कि बकाया मजदूरी की रकम कितनी है।
खादी कार्यालय के व्यवस्थापक किरीट भोई ने बताया कि जल्द ही बकाया भुगतान कर दिया जाएगा। उन्होंने स्वीकार किया कि पोनी सप्लाई बंद हो जाने के कारण पिछले छह महीने से सूत कातने का काम गांव में बंद है। यहां से 13 किमी दूर ग्राम मेदनीपुर में कुछ साल पहले 25 लोग सूत कातने का काम कर रहे थे। आज केवल तीन चरखे चल रहे हैं।
छह माह से काम बंद
गांव के लोगों को बसना का खादी कार्यालय रुई सप्लाई करता है। इस रुई को कातकर धागा तैयार करने के बाद लोग खादी कार्यालय को देते हैं। मार्च 07 तक खादी दफ्तर सिर्फ 8-10 लोगों को ही रुई (पोनी) दे पाया, बाकी सारे चरखे बंद थे। गत मार्च के बाद से तो सप्लाई पूरी तरह से बंद हो गई। सूत कातने वाले गांव के लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। धागा नहीं बनने से कपड़ा तैयार नहीं हो पा रहा।
बिलाईगढ़ समेत प्रदेश के कई हिस्सों से बुनकर चिर्राचुंवा में तैयार होने वाला धागा खरीदने आते हैं। धागा तैयार नहीं होने से आसपास के इलाके के 50 से ज्यादा बुनकरों के सामने रोजी-रोटी की समस्या पैदा हो गई है। ग्राम सेवा समिति रायपुर के सचिव अजय तिवारी का कहना है कि चिर्राचुंवा समेत सभी गांवों में रुई पर्याप्त मात्रा में भेजी जा रही है।
समितियों के लिए सिहोर स्थित खादी ग्रामोद्योग केंद्र से रुई खरीदी जाती है। दो दिन पहले ही चिर्राचुंवा के लिए रुई भेजी गई है। सूत कातने वालों नियमित रूप से भुगतान किया जा रहा है। बसना के खादी कार्यालय का हाल ग्राम चिर्राचुंवा के जर्जर हो रहे चरखों से बेहतर नहीं है। पूरा भवन जर्जर हो चुका है। लाखों रुपए की आयातित मशीनें कंडम हालत में गोदाम में बंद हैं।