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लोकल ‘हीरो’ भी कोर्स में

रायपुर. शिक्षा विभाग ने अगले सत्र से स्कूलों में राज्य के संघर्षशील युवाओं की गाथाएं उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है। पहली किताब के लिए 20 कहानियां तैयार हो रही हैं। किताबें स्कूलों की लाइब्रेरी में होंगी। मिडिल स्कूल में इसका ‘छत्तीसगढ़ बिहान’ के नाम से पर्चा भी होगा।

अफसरों के मुताबिक निर्धन और ग्रामीण बच्चों में पढ़ाई का जज्बा भरने के लिए यह अनूठी पहल की जा रही है। आमतौर पर गरीब, अनपढ़ माता-पिता की संतानों में यह धारणा बनी रहती है कि वह कामयाबी के शिखर को चूम नहीं सकता। यही वजह है कि उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए उन्हीं में से कामयाब लोगों की संघर्ष गाथा लिखी जा रही है।

कहानियों का संकलन किया जा रहा है। प्रारंभ में 20 युवाओं की जीवनी तैयार की जा रही है। उसे किताब का रूप दिया जाएगा। किताबों की यह सीरीज जारी रहेगी और हर किताब में 20-20 कहानियां शामिल की जाएंगी। राज्य शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद किताबें लिख रहा है।

सी-मेट की व्याख्याता वंदना अग्रवाल कहानियों का आलेख तैयार कर रही हैं। शिक्षा सचिव नंदकुमार ने बताया कि यह किताबें पंचायतों में भी होंगी। बच्चे इस किताब के करीब हो, इसके लिए छत्तीसगढ़ बिहान के नाम से पर्चा भी लिया जाएगा। यह अनिवार्य होगा।

इनकी कहानियां तैयार

प्यून से अफसर :

परसदा के साधारण किसान के बेटे अंकेश्वर साहू ने गरीबी से लड़कर ऊंचाइयां लांघी हैं। गांव में मिडिल स्कूल तक पढ़ने के बाद 9 वीं 12 वीं तक खोरपा हायर सेंकेंडरी स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। वे रोज 18 किलोमीटर आना-जाना करते थे। sahu

इस बीच उनके बड़े भाई और पिता का निधन होने से वे टूट गए। मां परमा साहू और छोटे भाई नरेंद्र की जिम्मेदारी उन पर आ पड़ी। वे 1994 में काम की तलाश में रायपुर आए। हाइड्रोलिक कंपनी में बतौर प्यून 500 रुपए माहवारी पर नौकरी शुरू की और आज वह वहीं पर अफसर हैं।

मजदूर से इंजीनियर :
कमासीपारा के संतोष कुमार मेहर के जीवन की सच्चई भी कम प्रेरणास्पद नहीं है। मजदूर के रूप में काम शुरू करके वे सर्विस इंजीनियर के पद पर पहुंचे हैं। उनके पिता जूते-चप्पल बेचकर पत्नी और पांच बच्चों की आजीविका चलाते थे। इसलिए बच्चों की पढ़ाई में काफी रुकवटें आईं। श्री मेहर ने प्राइमरी नवापारा की डबरी स्कूल और मिडिल की पढ़ाई महाराणा प्रताप स्कूल से की। engineer

9 वीं से 11 वीं वे गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ ही रहे थे कि पिता एसएल मेहर का निधन हो गया और परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ पड़ी। रोलिंग मिल में और सीमेंट फैक्ट्री में मजदूरी, बसों में कंडेक्टरी आदि न जानें कहां-कहां धक्के खाते रहे और इसी बीच आईटीआई से डीजल मैकेनिक का कोर्स कर लिया।

तीन साल पहले रजत इंटरप्राइजेज में 500 रुपए में नौकरी ज्वाइन करने के बाद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और मालिकों ने उनकी लगन देखते हुए बेंगलूर से ट्रेनिंग भी करवाई। अंतत: वे सर्विस इंजीनियर हो गए। अब उन्हें भरपूर वेतन और सम्मान मिल रहा है।

भास्कर की स्टोरी भी शामिल
श्रीमती अग्रवाल ने बताया कि शिक्षा विभाग भास्कर में प्रकाशित भैंसमुड़ी मगरलोड के मजदूर छात्र तुमनचंद साहू की संघर्ष गाथा को किताब में शामिल करेगा। इस छात्र ने कमरतोड़ मजदूरी करने के बाद भी 12 वीं में मेरिट के अंक हासिल किए।

अब वह इंजीनियरिंग कालेज में तृतीय वर्ष का छात्र है। इसके अलावा ठेकेदारी करने वाली युवती, चाट का ठेला लगाकर बीवी को अफसर बनाने वाले और स्टेशन की सफाई कर कंप्यूटर इंजीनियर बनने वालों की कहानियां भी कोर्स में होंगी।





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