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बढ़ सकती हैं प्रदेश के मरीजों की दिक्कतें

भोपाल. चिकित्सकों की कमी झेल रहे प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को एक और झटका लग सकता है। हाईकोर्ट के एक आदेश ने राज्य के ऐसे 950 डॉक्टरों के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) का रास्ता साफ कर दिया है, जिन्होंने इसके लिए आवेदन किया था।

स्वास्थ्य विभाग ने पहले उन्हें यह कह कर वीआरएस देने से मना कर दिया था कि उन्होंने 25 साल की सेवा पूरी नहीं की है। इस निर्णय से स्वास्थ्य विभाग को एक साथ 950 डॉक्टरों को वीआरएस देना पड़ सकता है। इससे उन लोगों को भी दिक्कत होनी तय है जो इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं।

क्या है पृष्ठभूमि:
सन् 2001 से 2005 के बीच प्रदेश के 950 डॉक्टरों ने वीआरएस के लिए आवेदन दिया। वे पदोन्नति तथा क्रमोन्नति के लिए विभाग में अपनाई जा रही प्रक्रिया से नाखुश थे।

पहले से ही चिकित्सकों की कमी का सामना कर रहे विभाग के लिए इतनी बड़ी संख्या में सेवानिवृत्ति देना संभव नहीं था। इसलिए नियमों में संशोधन कर वीआरएस के लिए 20 की बजाय 25 साल की न्यूनतम नौकरी का बंधन कर दिया गया। यह निर्णय पिछले साल 7 अप्रैल को लिया गया। जबकि इसकी चपेट में उक्त सभी 950 आवेदन भी आ गए।

अदालत पहुंचा मामला
उज्जैन जिले में पदस्थ सहायक शल्य चिकित्सक डॉ. उमेश चंद्र शर्मा ने 31 अक्टूबर, 05 को वीआरएस का आवेदन दिया था, जिसे विभाग ने पिछले साल 21 जून को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि आवेदन के समय उनकी 25 साल की सेवा पूरी नहीं हुई है। इसके खिलाफ डॉ. शर्मा ने हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के समक्ष याचिका दायर की।

आया निर्णय
सुनवाई के बाद अदालत की डबल बेंच ने गत 8 फरवरी को दिए निर्णय में सरकार से कहा कि 25 साल की सेवा के बाद ही वीआरएस का नियम 7 अप्रैल, 06 को बनाया गया। इस तिथि से पहले वीआरएस का आवेदन करने वाले डॉ. शर्मा 20 साल की सेवा के बाद भी इसके पात्र हैं।

न्यायालय ने कहा कि विभाग डॉ. शर्मा को 1 दिसंबर, 05 से सेवानिवृत्त मानकर उनके समस्त भुगतान करे अन्यथा उसे याचिकाकर्ता को 12 प्रतिशत की दर से ब्याज भी अदा करना होगा। हाल ही में सरकार ने न्यायालय के इस निर्णय का पालन कर दिया है।

कोढ़ में खाज
इस आदेश के बाद उन सभी डॉक्टरों को भी इसका लाभ मिलने की उम्मीद है, जिन्होंने 20 साल की सेवा पूरी की है तथा 7 अप्रैल, 06 के स्वास्थ्य विभाग के निर्णय के पूर्व ही वीआरएस का आवेदन दे दिया था।

यह स्थिति स्वास्थ्य विभाग के लिए कष्टदायी साबित हो सकती है, क्योंकि उसे एक साथ 950 चिकित्सकों को वीआरएस का लाभ देना पड़ सकता है, जबकि वह पहले से ही चिकित्सकों की कमी से जूझ रहा है।

हालत यह है कि राज्य में औसतन प्रति एक लाख मरीजों के लिए महज 32 सरकारी डॉक्टर हैं। सन् 2002 तक यह औसत प्रति लाख 87 था। जबकि नियम कहते हैं कि औसतन पांच हजार की आबादी पर एक-एक चिकित्सक और डिस्पेंसरी की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रदेश की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था
प्रदेश में एक लाख की आबादी पर स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति
संस्थाएं वर्ष 2002 में वर्ष 2007 में
एलोपैथिक चिकित्सालयों और 4 2
औषधालयों की संख्या

अस्पतालों में पलंग की स्थिति 87 32
डॉक्टरों की संख्या 61 06
चिकित्सकों की संख्या
पद स्वीकृत पद कार्यरत रिक्त
चिकित्सा अधिकारी 4972 3632 755
विशेषज्ञ 759 504 255

इसके साथ ही हाल ही में चिकित्सकों की कमी को देखते हुए 585 संविदा चिकित्सकों की भर्ती की गई थी, जिनमें से लगभग 200 चिकित्सकों ने कांट्रेक्ट पर काम करना पसंद किया। बाकी ने नौकरी से किनारा कर लिया।

कमी तो है
>> कोर्ट के आदेश का सरकार पालन करेगी। प्रदेश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए कलेक्टरों से चिकित्सकों की नई भर्ती करने के लिए कहा गया है। प्रदेश में पूर्ववर्ती सरकारों ने एक भी नया मेडिकल कॉलेज खोले जाने की पहल नहीं की। इसलिए हम तो डॉक्टरों की भर्ती कर रहे हैं, लेकिन डॉक्टर नहीं मिल रहे हैं।
अजय विश्नोई, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री





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