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क्यों बना दी हम राजस्थानियों के लिए राजनीति की जेल?

विशेष संपादकीय.jail गुर्जर आंदोलन से निपटने के लिए राज्य सरकार ने स्कूलों को तो अस्थायी जेलों में बदल दिया है -लेकिन साथ ही तैयार कर दी है राजनीति की स्थायी जेल। जनजाति दर्जे की मांग से शुरू हुई एक चिंगारी कब सरकार की भयंकर भूल से दिए वादे (जिन्हें अब आश्वासन कहा जाता है) की वजह से धधकती आग बन गई - पता ही न चला।

इसमें ‘आरक्षण बंट जाने’ के खतरे से उठीं लपटें पिछले पांच माहों से आमजन को कितना झुलसा चुकी हैं - इसका सरकार को सिर्फ हिसाब ही नहीं देना होगा, बल्कि इलाज भी करना होगा।

फिर से दहशत क्यों?
गुर्जर समुदाय ने सबसे अच्छा संकल्प यह लिया है कि इस बार आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण होगा। यही नहीं, मीणा समुदाय ने भी अहिंसक विरोध की घोषणा की है। बावजूद इन सबके, पूरा देश एक ही सवाल पूछ रहा है : क्या राजस्थान जाना सुरक्षित है? कहने को तो यह एक सामान्य जिज्ञासा हो सकती है, लेकिन समझने पर पता चल रहा है कि यह बड़ी बदनामी का कारण बन गई है।

क्योंकि एक बार ऐसी ‘सोच’ स्थापित हो गई तो ‘सचाई’ पर निश्चित ही हावी हो जाएगी। दूसरा यह कि आंदोलनों की त्रासदी रही है कि ये शुरू तो नियोजित रूप से हो जाते हैं - फैलते समय न नेतृत्व की सुनते हैं न सामान्य व्यवहार करते हैं। यही कारण है कि राज्य में दहशत है। हालांकि हालात और इंतजाम दोनों बेहतर हैं।

जिम्मेदार कौन?
सारा राज्य त्रस्त है। हर कोई जानना चाहता है - आखिर रोज-रोज विरोध आंदोलन - बंद - छुट्टियां क्यों? शांतिप्रिय राजस्थानी ऐसी किसी घुटन के आदी नहीं। हिंसा-तोड़फोड़ न भी हो, तो भी आवागमन-पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित करने वाले माहौल की जिम्मेदार पहले तो वसुंधरा सरकार थी ही - इस बार वह दो दोषों की आरोपी है - पहला यह कि चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट वह समय पर नहीं तैयार करवा सकी, दूसरा यह कि कोई ऐसी रणनीति बनाना तो दूर - जिनसे आंदोलन शांत हो सके - वह उग्र भाषा बोलने लगी।

स्वयं मुख्यमंत्री इस अतिसंवेदनशील मसले पर ‘बाहरी आदमी’, ‘साजिश’ वगैरह की तल्ख शैली अपना रही हैं। इससे पहले आंदोलनकारियों की बैठकों में भाषा का स्तर क्या रहा - इसे लेकर बहस से क्या फायदा? आंदोलन तो अपमान से उपजे आवेश के कारण आक्रामक ही होते हैं।

फिर छह करोड़ राजस्थानियों के नेतृत्व के लिए यदि आप चुने गए हैं तो आलोचना सहने का, हर तरह के आक्रोश का सामना करने का और तिस पर भी जनहित में विनम्र संघर्ष जारी रखने का बड़ा माद्दा और उससे भी बड़ा दिल रखना होगा। भाजपा आंदोलनकारियों की भाषा पर कड़ी आपत्ति जता चुकी है - अब इसे भूलना होगा।

हल कब निकलेगा?
हल निकलना न तो इतना आसान है, न ही किसी के हाथ में है। हां, तकनीकी हल उस दिन निकल जाएगा, जिस दिन कमेटी तथ्यात्मक रिपोर्ट दे देगी - जिसे राज्य सरकार ज्यों का त्यों केंद्र सरकार को भेज देगी। यानी जिन्हें फैसले की जिम्मेदारी दी गई है वे दरअसल डाकिये की भूमिका में हैं।

वैसे केंद्र के कोई इरादे नहीं हैं कि यह लंबी-चौड़ी प्रक्रिया के बाद भी इसे अंतिम मुहर के लिए अपनी मेज पर लाए। यही कारण है कि कांग्रेस की अजीबोगरीब दशा हो गई है। कुछ कर न पाने की विवशता और विरोध की अनिवार्यता के जाल में वह बुरी तरह उलझ गई है। बहरहाल, इसका हल किसी के पास नहीं है - कोई करना भी नहीं चाहता।

..तो होगा क्या?
आंदोलन अपनी जगह चलेगा। सरकार की मनुहार अपनी जगह। आदिवासियों से जोड़कर इसके विरोध को बड़ा आकार देने की रणनीति अलग चलेगी। अगर शांति से कोई नहीं चल पाएगा तो वे हैं हम राजस्थानी जिनकी राह में नफरत के रोड़े खड़े कर दिए गए हैं।





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randhir
Tuesday, 2nd Oct 2007, 11:59
I think current goverment is fully resposible for this issue. Poltician is playing game only if someone deserve for the reservation then why they do not think seriously on this matter. Meena is very strong community in rajasthan in everyfield then why reservation is continue for them.