जालंधर जालंधर के डिवीजन-8 थाने में विभिन्न आरोपों में गिरफ्तार कर लाए गए लोगों को जंजीरों से बांध कर रखा जाता है। थाने में बंदीगृह नहीं है, इसके नाम पर गले हुए टीन की छत है। पुलिस का तर्क है कि अपराधियों को खुला नहीं छोड़ सकते, अगर भाग गए तो नौकरी जाएगी। यदि किसी महिला को गिरफ्तार किया जाता है तो वह जी का जंजाल बन जाती है, क्योंकि उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
10 वर्ष से यह थाना किराए के मकान में है। मकान मालिक ने खाली कराने के लिए कोर्ट में केस दायर कर रखा है। पुलिसकर्मियों के लिए शौचालय नहीं है और गार्ड रूम भी नहीं है। बरामद सामान रखने के लिए मालखाना भी यहां नहीं है, वायरलैस रूम सीलन भरा है। हालांकि जालंधर पुलिस के लिए यह थाना बहुत अहम है।
इसके तहत काजी मंडी और किशनपुरा जैसे आपराधिक वारदातों वाले इलाके आते हैं। इसके अलावा 51 मोहल्ले, 10 बैंक, 3 डाकघर, 20 मंदिर, 1 मसजिद, 17 गुरुद्वारे, 14 स्कूल, 1 कालेज और तीन अस्पताल भी इसी थाने में आते हैं। ऐसा है थाने का नजारा थाने के आंगन में बरामद किए गए स्कूटरों के कबाड़ पड़े हैं, खाली टीन और ड्रमों से आंगन भरा हुआ है। एक ओर टूटे टीन की छत है। टूटे सोफे के अलावा बहुत सा कचरा रखा है। कुछ मोटरें रखी हैं, यहीं अपराधियों को एक मोटर से बांधकर बैठाया जाता है। आसमान तले इस बंदीगृह में बरसात या सर्दी की रातें कैसे काटी जाती होंगी यह कल्पना की जा सकती है।
और भी हैं ऐसे थाने-चौकी : जालंधर में इस तरह के और पुलिस स्टेशन भी हैं जहां पुलिस के पास अपराधियों से निपटने के लिए आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं। इनमें चौकी नंबर एक, सात, छह और पांच हैं।
सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था : सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के तहत किसी मामले के संदेह में या किसी आरोप में गिरफ्तार किए गए लोगों और विचाराधीन कैदियों को जंजीरों से नहीं बांधा जा सकता और न ही उन्हें हथकड़ी पहनाई जा सकती है।
जालंधर जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष आर.के.भल्ला का कहना है कि किसी भी प्रकार के बंदी को बांध कर नहीं रखा जा सकता, यह मानवाधिकारों का हनन है। उन्हें बांधकर रखना अगर पुलिस की मजबूरी है तो इसमें गलती सरकार की है जो आधारभूत ढांचा मुहैया नहीं करा रही।
मैंने जानकारी हासिल की है, आपकी बात सही है। मेरी कोशिश रहेगी कि इस थाने में बंद किए जाने वाले लोगों के अधिकारों का ध्यान रखा जाए। जगह की कमी का कुछ-न-कुछ समाधान जल्द ही निकाल लिया जाएगा। -संजीव कालड़ा, आईजी, जालंधर जोन
मैजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस किसी बंदी को हथकड़ी नहीं लगा सकती, न ही जंजीरों से बांध सकती है। यह संविधान की धारा 21 के तहत जीने के अधिकार का भी हनन है। -सी.एस. बख्शी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, चंडीगढ़