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गठबंधन राजनीति का विद्रूप चेहरा

सम्पादकीय. जनता दल-सेक्युलर के अड़ियल रवैये के कारण कर्नाटक में होने वाली सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के अधर में लटक जाने से गठबंधन की राजनीति का एक और विद्रूप चेहरा सामने आया है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पुत्र एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में 20 महीने पहले जब राज्य में जद-एस और भाजपा की साझा सरकार बनी थी, तब दोनों पार्टियों में यह सहमति भी बनी थी कि वर्तमान विधानसभा के कार्यकाल के शेष 20 महीनों के लिए सरकार का नेतृत्व भाजपा को सौंप दिया जाएगा। लेकिन सत्ता हस्तांतरण की तारीख करीब आने के साथ ही देवेगौड़ा-कुमारस्वामी पिता-पुत्र की जोड़ी की नीयत में खोट साफ नजर आ गया और वे 20 महीने पूर्व हुई सहमति को तोड़ने के लिए बहानों की तलाश करने लगे।

संयोग से भाजपा कोटे के मंत्री श्रीरामुलू ने कुमारस्वामी पर उनकी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाकर यह बहाना उपलब्ध भी करा दिया। अब भाजपा नेतृत्व द्वारा श्रीरामुलू से इस्तीफा दिलवा दिए जाने के बाद भी देवेगौड़ा और कुमारस्वामी सत्ता हस्तांतरण का वादा पूरा करने में हीला-हवाला कर रहे हैं। कुमारस्वामी कह रहे हैं कि सत्ता हस्तांतरण की बाबत सहमति उनके और भाजपा के कुछ नेताओं के बीच हुई थी न कि दोनों पार्टियों के बीच। उनके पिताश्री का कहना है कि उनकी पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति 5 अक्टूबर को दिल्ली में बैठक कर अंतिम फैसला करेगी। पिता-पुत्र के इस रवैये से भाजपा का क्षुब्ध और आक्रोशित होना स्वाभाविक है।

उसे भरोसा नहीं है कि 5 अक्टूबर के बाद भी कुमारस्वामी सहजता से सत्ता हस्तांतरण के लिए राजी हो जाएंगे। इसीलिए उसने स्पष्ट जनादेश मिलने की उम्मीद से चुनाव मैदान में जाने की तैयारी जता दी है, मगर ऐसा करके भाजपा खुद पर लगे अवसरवादी राजनीति करने के आरोप को धो नहीं सकती है। उसने जद-एस के साथ अवसरवादी गठबंधन नहीं किया होता, तो कुमारस्वामी जैसे अवसरवादी को 20 महीने का सत्ता-सुख नहीं मिला होता। कुमारस्वामी के मुख्यमंत्रित्व-काल में जो कुछ अच्छा या बुरा हुआ, भाजपा उसमें बराबर की भागीदार रही है।

जद-एस और भाजपा के इस झगड़े में ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति अपनाकर कांग्रेस ने व्यावहारिक राजनीति की है। एक बार धोखा खाने के बाद वह जद-एस पर भरोसा कर भी कैसे सकती है? कर्नाटक में अनिश्चितता का यह दौर समाप्त करने के लिए जरूरी है कि वहां के राज्यपाल कोई नया अवसरवादी गठबंधन बनने का इंतजार करने की बजाय राष्ट्रपति शासन लगाकर विधानसभा के नए चुनाव कराने की सिफारिश करें।





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