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शांति से बीता शक्ति-पर्व, अब त्योहारों की बारी

विशेष संपादकीय. हम इसे शक्ति-पर्व कह सकते हैं। आरक्षण लेने पर आमादा गुर्जरों की सफलता की शक्ति सारे देश ने देखी। बर्बरता के लिए बदनाम पुलिस के धैर्य की शक्ति सबने परखी। भयंकर भूलों के कारण विवादित वसुंधरा सरकार की प्रशासनिक तैयारियों की शक्ति सबने जानी।

कैसे शांत रहा?
आंदोलनकारी गुर्जरों के नारे गगनभेदी थे और हौसले सातवें आसमान पर। मां, पत्नी और बहन के टीके से दमकते गुर्जर थे तो जबर्दस्त गुस्से में। फिर पत्ता भी क्यों न हिला? साफ है गरम और नरम नेतृत्व के रूप में विभाजित होने के बावजूद उनमें अहिंसा की एकता का पुरुषार्थ था। गांधी का दिन उन्होंने काफी सोच-समझकर ही चुना होगा। हजारों-हजार के लिए चारों ओर अनुशासन रखना भारी चुनौती थी। लेकिन पिटाई भी यदि हुई तो सिर्फ सूखे ढोलों की। साधुवाद कौन न देगा?

..फिर भी गलती कहां हुई?
जहां सरकार ने इस बार मैदानी मामलों में मुस्तैदी दिखाई, वहीं दोपहर होते ही उसने राजनीतिक गलतियां शुरू कर दीं। गिरफ्तारी की संख्या कम बताना ही उसका परम कर्तव्य बन गया। मंत्री हों या अफसर - हर कोई गुर्जरों के आंकड़ों को आधा खारिज कर सरकार में अपने अंक बढ़वाता रहा। सूझ-बूझपूर्ण तो यह होता कि कितने आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी हुई - इस पर वसुंधरा सरकार नॉन-कमिटल रहती। गुर्जरों का दावा यदि साढ़े चार लाख का है तो इसे कम न करने से सरकार का तो फायदा ही होता कि इतनी विराट संख्या के बावजूद बाल तक न बांका हुआ। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को तर्क-वितर्क और वाद-विवाद की आदत पड़ गई है। जो सत्तारूढ़ दल के समर्थकों की संख्या पर गलत असर डाल सकती है।

इनका छोर कहां?
आंदोलन को आगे चलाने और तेज करने के लिए संख्या के साथ संयम बढ़ाना जरूरी होगा। यह प्रश्न इसलिए उठा है क्योंकि तेवर और भाषा दोनों तीखे होते चले जा रहे हैं। आरक्षण मांग रहा समुदाय ईंट से ईंट बजाने की बात कर रहा है तो विरोध कर रहे वर्ग का नारा पत्थर का जवाब तीर है। यही नहीं, सरकार न जाने कब किस ‘माई के लाल’ को ललकार दे, कुछ पता नहीं। सच तो यह है कि आज अमन-चैन से सबकुछ घट जाने के बाद कुछ ताकतों को तो बबूल बोने के लिए नई जमीन की तलाश होगी ही। चल रहे संघर्ष की व्याख्या दिनकर की इन पंक्तियों से हो सकती है -
कहीं था जल रहा कोई किसी की शूरता से
कहीं था क्षोभ में कोई किसी की क्रूरता से।
कहीं उत्कर्ष ही नृप का नृपों को सालता था
कहीं प्रतिशोध का कोई भुजंगम् पालता था।

हालांकि अब राजस्थानी इसे और बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्हें नवरात्रि, दुर्गा पूजा और दीप महोत्सव की तैयारियां प्रेम से करने दीजिए।





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