Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे . फिल्मकार श्रीराम राघवन प्रतिभाशाली हैं। वह विजय आनंद को अपना आदर्श तथा उपन्यासकार जेम्स हेडली चेइज को गुरु मानते हैं। उनकी अब तक प्रदर्शित फिल्में ‘एक हसीना थी’ और ‘जॉनी गद्दार’ पर विजय आनंद और चेइज का प्रभाव होते हुए भी राघवन का अपना बहुत कुछ है। उन्हें माध्यम के ग्रामर की अच्छी खासी जानकारी है। ‘जॉनी गद्दार’ की पटकथा के गढ़ने में उन्होंने जो काम किया है, वह काबिले तारीफ है।
वे इतने सधे हुए निर्देशक हैं कि उन्होंने धर्मेद्र को अतिरेक नहीं करने दिया और नवयुवक नील नितिन मुकेश से विश्वसनीय अभिनय करा लिया। इत्तेफाक और हालात से मजबूर होकर किए गए हर कत्ल पर नायक शर्मसार है और यह ग्लानि बड़ी किफायत से प्रस्तुत की गई है। ‘जॉनी गद्दार’ के निर्माण के समय श्रीराम राघवन की जिद थी कि नवीन निश्चल और अमिताभ बच्चन अभिनीत पुरानी फिल्म ‘परवाना’ को 18 लाख रुपए दिए जाएं, क्योंकि उनकी पटकथा में ‘परवाना’ से प्रेरित नायक चोरी करता है। अगर 30 सेकंड की ‘परवाना’ की क्लिपिंग फिल्म में नहीं भी होती, तो क्या फर्क पड़ता। ‘परवाना’ भी जेम्स हेडली चेइज के उपन्यास पर आधारित थी और फिल्म में नायक को यह उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार दिखाया गया था।
क्या श्रीराम राघवन ने चेइज को धन भिजवाने की पहल की? यह बात ऐसी ही है कि फिल्म ‘कर्ज’ के अधिकार के लिए जो निर्माता पैसा दे रहा है, उसने सुभाष घई से कभी नहीं पूछा कि क्या उन्होंने ‘रीइनकारनेशन ऑफ पीटर प्राउड’ के निर्माता से अधिकार खरीदे थे।
श्रीराम राघवन को भारतीय सिनेमा का गहरा अध्ययन करना चाहिए। अभी तक उन्होंने अमेरिका के नोए सिनेमा का ही ज्ञान प्राप्त किया है। अगर पश्चिम के प्रति उनका आग्रह इतना गहरा है तो उन्हें हिचकॉक की फिल्मों से प्रेरणा लेनी चाहिए। अगर मुमकिन हो, तो विजय आनंद को प्रभावित करने वाले राज खोसला की फिल्में भी देखनी चाहिए। विजय आनंद ने केवल ‘ज्वेलथीफ’ या ‘जॉनी मेरा नाम’ फिल्में ही नहीं बनाई हैं, बल्कि फिल्म ‘गाइड’ भी रची है। इसके साथ ही उन्होंने प्रसिद्ध उपन्यास ‘द सिटाडेल’ से प्रेरित होकर फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ भी बनाई है। अब राघवन को अपने डैने फैलाकर ऊंची उड़ान भरनी चाहिए।
महान गायक मुकेश के पोते और नितिन के सुपुत्र नील की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने अपनी पहली ही फिल्म के लिए इतनी साहसी भूमिका का चुनाव किया। यह पात्र प्रेम भी करता है तो एक विवाहिता के साथ और कत्ल भी करता है तो आत्मग्लानि के साथ। आमतौर पर नए नायक या तो गिटार के साथ प्रस्तुत होते हैं या गन के साथ। नील ने मानवीय कमजोरियों वाले चरित्र को चुना। भले ही यह फिल्म टिकट खिड़की पर कोई करिश्मा न दिखाए, परंतु निर्माताओं और आलोचकों की प्रशंसा नील को मिलेगी। आजकल नए कलाकारों का आग्रह है कि वे युवा निर्देशकों के साथ ही काम करेंगे अर्थात अनुभव पर उम्र भारी पड़ रही है। 70 वर्ष के यश चोपड़ा ‘दिल तो पागल है’ और ‘वीर-जारा’ फिल्में बना सकते हैं, तो अन्य अनुभवी कुछ तो कर सकते हैं। राज कपूर ने उम्र के 50वें वर्ष में ‘बॉबी’ जैसी फिल्म बनाई थी।
बहरहाल श्रीराम राघवन सैफ अली के साथ फिल्म ‘एजेंट विनोद’ बना रहे हैं, तो क्या वे इयान फ्लेमिंग, जिन्होंने ‘जेम्स बांड’ फिल्म की रचना की थी, को भी डॉलर भेजेंगे? फिल्म खर्चीला माध्यम है, परंतु इसे धन बर्बाद करने का जरिया नहीं बनना चाहिए। श्रीराम राघवन और नील नितिन जैसे प्रभावशाली लोगों को अपने उद्योग और देश के इतिहास की भी थोड़ी जानकारी प्राप्त करना चाहिए।