जयपुर. ‘‘जाति व वर्ग के आधार पर कोई भी जनजाति में शामिल नहीं हो सकता। सत्ता मिलने के बाद जनजाति वर्ग के लोगों को ईमानदारी व आदिवासियों के कल्याण हित में रखते हुए काम करने चाहिए।’’ अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन समारोह में मंगलवार को सांसद व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा ने ये विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार को समय आने पर आरक्षण के मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर ही कोई निर्णय करना चाहिए। अनुसूचित जनजाति को आरक्षण जाति के हिसाब से नहीं, बल्कि सामाजिक रहन-सहन और भौगोलिक स्थिति के आधार पर मिला हुआ है। झारखंड, मिजोरम और सिक्किम सहित कई राज्यों में आदिवासी मुख्यमंत्री हैं और उनकी सरकार में भी 60 प्रतिशत मंत्री आदिवासी हैं। इसके बावजूद वे लोग आदिवासियों के कल्याण के लिए कोई कार्य नहीं कर रहे हैं।
पत्थर का जवाब तीर से देंगे: आंध्र प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरसिंह तिलावत ने कहा कि गुर्जर आरक्षण लेने के लिए जेल भरो आंदोलन कर रहे हैं और मुख्यमंत्री गुर्जरों की समधन बनकर उनके लिए जेल बनवा रही हैं। आज देश आजाद हो चुका है, लेकिन आदिवासी अभी भी आजाद नहीं हुए हैं। अब सभी आदिवासियों को आजादी के लिए एकजुट होकर और सुनियोजित तरीके से लड़ाई लड़नी पड़ेगी।
राष्ट्रीय स्तर पर विरोध होगा: परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोमजीभाई डामोर ने कहा कि जयपुर सम्मेलन में आदिवासियों के हितों को लेकर किए गए विचार मंथन के बारे में केन्द्र सरकार और राज्य सरकार को बताया जाएगा। आदिवासियों के आरक्षण में सेंध मारने वालों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विरोध किया जाएगा।
अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हों आदिवासी: स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मीनारायण जरवाल ने कहा कि आदिवासियों के साथ आज भी अत्याचार हो रहे हैं। इनसे मुक्ति पाने के लिए उनको एक होना होगा।
आदिवासी मां की कोख से जन्म लेना होगा: पूर्व सांसद उषा मीणा ने कहा कि जनजाति में शामिल होने के लिए पहले गुर्जरों को आदिवासी मां की कोख से जन्म लेना होगा। आदिवासी की तरफ उठी किसी की भी अंगुली उखाड़ दी जाएगी। जिस दिन सरकार ने केन्द्र सरकार को गुर्जरों के समर्थन में चिट्टी भेज दी उस दिन सड़कों पर लड़ाई लड़ी जाएगी।