जोधपुर. एक लाख 77 हजार लोगों की ब्लड जांच के लिए महज ढाई हजार निडल यानी एक निडल से सत्तर लोगों के खून की जांच करने की चिकित्सकीय लापरवाही का खुलासा हुआ है। चिकित्सा विभाग के आंकड़ों से तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में जहां लोगों में जागरुकता की कमी है वहां पर एक ही निडल का इस्तेमाल अनेक लोगों के साथ हो रहा है। ऐसे में एचआईवी सहित अन्य बीमारियों के संक्रमण से इनकार नहीं किया जा सकता।
मलेरिया जांच अभियान में इस वर्ष जनवरी से सितंबर तक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने जिले में एक लाख 77 हजार आठ सौ लोगों की ब्लड स्लाइड ली है। मगर इसके लिए केवल ढाई हजार निडल का ही उपयोग किया गया। हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि मरीज से निडल मंगवाते हैं, मगर दूर देहात में जहां लोगों में जागरुकता की कमी और चिकित्सा सुविधाओं का अभाव है, वहां पर मरीज के लिए निडल लाना भी संभव नहीं है।
इतना ही नहीं बीपीएल कार्ड धारी मरीजों के लिए भी विभाग की ओर से निडल नहीं दी जा रही है। इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत एएनएम और नर्सिग स्टाफ एक ही निडल से आने वाले सभी मरीजों के रक्त नमूने लेकर स्लाइड बना रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन कर्मचारियों ने विभाग से निडल नहीं मांगे है। कई बार मांगने के बाद भी इन्हें आज तक निडल नहीं दिए गए।
जानलेवा रोग फैलने की आशंका
* एक ही निडल से एक से अधिक लोगों की ब्लड स्लाइड लेने से हैपेटाइटिस बी, एचआईवी पोजिटिव सहित अन्य प्रकार बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है। उपचार के लिए एआरटी सेंटर में एचआईवी पोजिटिव मरीजों की संख्या प्रतिमाह बढ़ रही है मगर यह कहना मुश्किल है कि यह एक ही निडल के उपयोग से हुआ है। मरीजों में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों की संख्या बराबर है।
—डा. अरविंद माथुर, इंचार्ज, एआरटी सेंटर, डा. एसएन मेडिकल कॉलेज
* पहले तो सरकार से निडल मिल जाती थी और कभी नहीं मिलती तो हम खुद ही खरीद लेते थे। मलेरिया जांच के लिए अलग से ही निडल आती है जिसको हम स्प्रिट में डुबोकर रखते और उपयोग में लेते थे। डिस्पोजेबल निडल से एक से अधिक स्लाइड नहीं ली जा सकती। इससे मरीज में संक्रमण का खतरा रहता है।
—डा. एमएम व्यास, पूर्व संयुक्त निदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग
* विभाग से निडल नहीं दी जा रही है। इस कारण एक ही निडल से स्लाइड लेने की मजबूरी है। विभाग से कई बार निडल मांगे गए है मगर कोई सुनने वाला नहीं है। गांव के लोगों में जागरुकता नहीं होने के कारण लोग भी अपने साथ निडल लेकर नहीं आते।
—प्रीति रामदेव, जिलाध्यक्ष (ग्रामीण) राजस्थान नर्सेज एसोसिएशन
* तीन माह पूर्व दस डिस्पोजेबल निडल विभाग से मिली थी। इसके बाद नहीं दी गई। अब लोग भी जागरुक हो गए हैं, ऐसे में पुरानी निडल का उपयोग करने पर वो विरोध करता है, ऐसी स्थिति में मजबूरन हमें निडल खरीदनी पड़ती है।
—कैलाश मांगलिया, मेल नर्स, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, बनाड़
* हमें आज तक एक भी निडल नहीं मिली है। इसके चलते एक ही डिस्पोजेबल निडल से स्लाइड ले रहे हैं। उस निडल को स्प्रिट में धोकर बार बार काम में लेते हैं। विभाग से कई बार निडल देने को कहा मगर कोई फायदा नहीं हुआ।
—प्रमिला वैष्णव, नर्स, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मथानिया
* हम खुद ही निडल खरीद कर उपयोग में लेते हैं। कोई मरीज अच्छा होता है वह पैसे दे देता है बाकी तो हमें जेब से ही भुगतना पड़ता है। विभाग से कई बार मांगी गई है, मगर हर बार आश्वासन ही मिला।
—आशा जोशी, एएनएम, उप स्वास्थ्य केंद्र, नेवरा रोड
* सरकार से निडल मिलती ही नहीं है ऐसे में हम कहां से उपलब्ध करवाएं। एक रुपए में निडल आती है, मरीज खुद लेकर आए। तीन-चार दिन पहले ही आपदाकोष से तीन लाख निडल खरीदे हैं मगर अभी उनको सेंटर तक पहुंचाना है।
—डा. प्रेमलता माथुर, सीएमएचओ, जोधपुर