कोटा. ठंड की दस्तक के साथ ही अस्थमा व एलर्जी रोगियों में बैचेनी बढ़ गई है। इन रोगों से पीड़ित बड़ी संख्या में रोगी सरकारी व निजी अस्पतालों में पहुंचने लगे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि ठंड की शुरूआत के साथ ही अस्थमा व एलर्जी रोगियों में खांसी, जुकाम की शिकायत शुरू हो जाती है। इसके साथ ही रोगी की श्वांस नली सिकुड़ने लगती है तथा उसे सांस लेने में परेशानी होती है।
एमबीएस अस्पताल के चेस्ट एवं टीबी विभागाध्यक्ष डा. बी.एस.वर्मा ने बताया कि यह रोग उन चीजों से होता है जिनको एलर्जी होती है। उनके संपर्क में आने से श्वांस नली सिकुड़ जाती है। वैसे तो किसी को भी किसी भी वस्तु से एलर्जी हो सकती है। मगर,धुआं, धूल, बदबू, खुशबू, ठंड़ा मौसम, बर्फ, फंगस व जानवारों के बाल से अधिकांश लोगों को एलर्जी होती है।
प्रतिदिन 40 रोगी
एमबीएस अस्पताल में इन दिनों 40 से अधिक अस्थमा व एलर्जी रोगी उपचार कराने पहुंच रहे हैं। ये रोगी, चिकित्सकों से खांसी, जुकाम, आंख में पानी आने तथा श्वांस लेने में तकलीफ की शिकायत करते हैं।
क्या है अस्थमा रोग
अस्थमा को दमा, श्वांस, पसली चलना, एलर्जी वाली खांसी के नाम से भी जाना जाता है। यह छूत की बीमारी नहीं हैं।
कम्प्यूटराइज्ड स्पोइरोमीटर से जांच
अस्थमा का पता लगाने के लिए कम्प्यूटराइज्ड स्पाइरोमीटर से पलक झपकते ही अस्थमा रोग की स्थिति का पता लग जाता है। इस मशीन से यह भी पता लग जाता है कि दवा असर कर रही है या नहीं।
रोग उपचार के आधुनिक तरीके
इनहेलर : इसके माध्यम से दवा को गैस में घोलकर रखते है व इस गैस को श्वांस के साथ खींचते हैं।
रोटाहेलर: इस तकनीक से दवा का बारीक पाडर होता है। इसको श्वांस की हवा में उड़ाकर श्वांस के साथ खींचते हैं।
नेबूलाइजर: इस तकनीक में दवा को पानी या तरल द्रव्य में घोलकर उसको हवा में उड़ाकर भाप बनाई जाती है। इस भाप को श्वांस के साथ खींचते हैं।