अभिमत. आज जब गांधीजी का चरित्र, उनका आचरण और सत्य-अहिंसा के सिद्धांत, शांति के नोबेल पुरस्कार के मापदंड बन चुके हैं, ऐसे में नोबेल फाउंडेशन का यह पश्चाताप कोई मायने नहीं रखता कि गांधीजी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए था। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनके लिए पद, प्रतिष्ठा और सम्मान का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता।
ऐसे कालजयी चरित्रों की प्राण-प्रतिष्ठा लोकमानस में होती है। गांधी आज विश्व के लोकमानस में प्रतिष्ठित ऐसी ही विभूति हैं। भारत की आजादी की लड़ाई में सत्य-अहिंसा के सफल प्रयोग के बाद दुनियाभर में जहां-जहां भी मुक्ति आंदोलन हुए, वहां-वहां गांधी के सिद्धांतों ने सेनानियों को राह दिखाई।
अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर, दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला, डेसमंड टुटू और पोलैंड में सॉलिडरटी के नेता लेक वॉलेसा ने गांधीवाद को ही अपने आंदोलन के मूल में रखा। आज पड़ोसी देश म्यांमार के बौद्ध भिक्षु भी गांधीवादी तरीके से ही क्रूर सैनिक सत्ता का मुकाबला कर रहे हैं।
नोबेल फाउंडेशन को गांधीजी को पुरस्कार न दिए जाने का भले ही अफसोस हो, लेकिन गांधी के भौतिक अवसान के बाद जिन्हें भी नोबेल शांति पुरस्कार मिला है उन्हें आज विश्व में गांधीवादी के रूप में ही जाना-पहचाना जाता है। दुनिया में हिंसा, अराजकता, आतंक और युद्ध का जब-जब भी जोर बढ़ेगा, गांधीजी उतनी ही शिद्दत से याद किए जाते रहेंगे।
अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में जब शीतयुद्ध चरम पर था, तब दुनिया के नोबेल शांति पुरस्कार विजेताओं ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी करके कहा था कि दुनिया को बचाने के लिए गांधीवादी तरीके के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
यदि अल्फ्रेड नोबेल गांधी के समकालीन होते, तो वे भी वही कहते जो आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढ़ी यह यकीन नहीं कर पाएगी कि हाड़-मांस का एक ऐसा भी पुतला था जिसने अपने आचरण और सिद्धांतों से दुनिया की धारा ही मोड़ दी।