आलेख. ऑस्कर के लिए ऐसी दीवानगी क्यों? आखिर ऑस्कर कोई नोबेल पुरस्कार तो है नहीं, जहां सभी नामांकितों को समान नजरिए से ही देखा जाता है, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने से आते हों। जब टैगोर को साहित्य और मदर टेरेसा को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया, तो यह भारत के लिए बहुत बड़ी बात थी क्योंकि उन्होंने दुनिया के कुछ जबरदस्त नामांकितों को पीछे छोड़कर हासिल किया था।
गांधीजी का मसला तो और भी रोचक है। गांधीजी की उपेक्षा करना वास्तव में नोबेल पुरस्कार कमेटी की सबसे बड़ी नासमझी थी, जिसे उसने अब जाकर अपनी चूक माना है और पछतावा जताया है। वस्तुत: गांधीजी की अनदेखी कर कमेटी ने उन्हें और ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया।
ऑस्कर इस तरह के पुरस्कार नहीं हैं। दुनिया के लिए इन पुरस्कारों के ज्यादा मायने भी नहीं हैं। ये मूलत: बने हैं हॉलीवुड की प्रतिभाओं के लिए और निश्चित तौर पर हॉलीवुड दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सिनेमा का प्रतिनिधित्व नहीं करता। ईमानदारी से कहा जाए तो हॉलीवुड अंधाधुंध व्यवसायीकरण और महान यूरोपीय सिनेमा की हत्या के लिए जाना जाता है।
भारत और चीन के अलावा और कोई फिल्म इंडस्ट्री इसके परभक्षी तौर-तरीकों के चलते खड़ी नहीं रह पाई है यद्यपि ईरान, अर्जेटीना, कोरिया, ब्राजील, फ्रांस, जापान और स्पेन जैसे देश अभी भी कुछ अच्छी फिल्में बना रहे हैं।
ऑस्कर में बेस्ट फॉरेन फिल्म केटेगरी के अवार्ड का भी कोई खास महत्व नहीं है। इसका मंतव्य ऑस्कर की वैश्विक महत्ता को और पुख्ता करना है। इस श्रेणी के तहत जीतने वाली कई फिल्मों को तो अमेरिका में थियेटरों के दर्शन भी नसीब नहीं होते।
ऐसे में ऑस्कर में भेजने के लिए भारतीय फिल्म के चयन के नाम पर जो नौटंकी होती है, वह वास्तव में एक मजाक ही है। भारतीय फिल्मों ने कांस, वेनिस, टोरंटो, बर्लिन, लोकार्नो, हाउस्टन, सनडेंस, पाम स्प्रिंग्स और लंदन में कहीं अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार अर्जित किए हैं, लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं है। लोगों की दीवानगी ऑस्कर को लेकर ही है।
यही कारण है कि इस समय हमारे यहां उन दो फिल्मों को लेकर लड़ाई छिड़ी है, जो इस वर्ष ऑस्कर के लिए भारत का प्रतिनिधित्व चाहती हैं, जबकि वे इसकी बिलकुल हकदार नहीं हैं। ‘एकलव्य’ विधु विनोद चोपड़ा की अब तक की सबसे घटिया फिल्म है। इसे कैसे चुन लिया गया, यह एक चमत्कार है। हास्यास्पद बात यह है कि जूरी के सभी सदस्य अब इस निर्णय से खुद को दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं।
उनमें से कुछ ने तो दबे स्वर में यह माना भी है कि यह एक गलत निर्णय था। दूसरी फिल्म ‘धर्म’ की दशा तो और भी दयनीय है। मुझे आश्चर्य है कि इसके निर्माता को वास्तव में लगता है कि यह ऑस्कर जीत सकती है और इसके लिए उन्होंने अदालत का दरवाजा तक खटखटाया है। ‘एकलव्य’ का चुनाव करने वाली कमेटी ने इसके पक्ष में तरह-तरह के बचकाना तर्क दिए हैं।
मसलन- ‘एकलव्य’ के निर्माता के पास ‘धर्म’ के निर्माता की अपेक्षा ऑस्कर में टिके रहने के लिए कहीं अधिक पैसा और संसाधन हैं। दूसरी मिसाल तो और भी घटिया है- ऑस्कर के लिए लॉबिंग करने हेतु हॉलीवुड में बेहतर संपर्क होने चाहिए जो चोपड़ा के पास हैं, अतएव ‘एकलव्य’ को भेजा जा रहा है।
तीसरे तर्क के बारे में तो कहना ही क्या-: ‘एकलव्य’ के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ‘धर्म’ की अपेक्षा बेहतर रहे हैं। ये सभी तर्क दिखावटी और बचकाने हैं और इन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी बीमारी, यानी इसकी अंदरूनी राजनीति को ढांपने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
अतीत में हमारी दो फिल्में ‘झंकार बीट्स’ और ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ शॉर्टलिस्टेड हुई थीं, लेकिन दोनों बाहर हो गईं। नहीं, उन्हें बेहतर फिल्मों ने नहीं पछाड़ा। उन्हें तो लॉबिंग और राजनीति ने पीछे छोड़ दिया।
यह देखकर आज भी पीड़ा होती है कि किस तरह निरंतर घटिया फिल्में आधिकारिक ऑस्कर प्रविष्टि के तौर पर चुनी जा रही हैं। ‘लगान’ इसका एकमात्र अपवाद रही। यही कारण है कि यह अंतिम चरण तक पहुंची। वरना तो ‘पहेली’ जैसी दूसरी फिल्में पहले ही दौर में बाहर हो गईं। ऐसी एकमात्र फिल्म जिसे इस वर्ष शॉर्ट लिस्ट किया जा सकता था, वह है ‘ब्लैक फ्रायडे’। इस फिल्म में जीवटता थी।
इसका विषय भी बिलकुल सही था। लेकिन इस फिल्म के नाम पर विचार ही नहीं किया गया क्योंकि निर्माता ने इसे नहीं भेजा। क्या कमेटी इतनी नासमझ और अहंकारी है कि यह अच्छी फिल्म को नहीं बुला सकती। जबसे ‘श्वास’(एक अच्छी फिल्म लेकिन ऑस्कर के लिहाज से गलत चुनाव) वहां जमी बर्फ पिघलाने में असफल रही है, हमने भी क्षेत्रीय सिनेमा की उपेक्षा करना शुरू कर दिया है।
‘पहेली’ और ‘एकलव्य’ जैसी फिल्मों की अपेक्षा ‘चोखेर बाली’ जैसी फिल्म के लिए ऑस्कर में ज्यादा संभावनाएं हो सकती हैं। वास्तव में हमने अब तक ऑस्कर की मूरत केवल एक बार ही हासिल की है और वह भी बांग्ला फिल्मकार सत्यजीत राय को मिले लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड के रूप में, यह बात उन सनकी लोगों को कौन समझाए, जो यहां बैठकर हमारी फिल्मों का निर्णय करते हैं?
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार हैं।