दो पहलू.
रविशंकर प्रसाद
भारत के संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का निर्णय देश का अंतिम कानून है। सुप्रीम कोर्ट के एंसिलरी पावर्स की धारा 140, 141 तथा 142 में साफ कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, निर्देश और आदेश पूरे देश में सब पर अनिवार्य है। पहली बात यह है कि एम करुणानिधि और प्रकाश करात मनमोहन सिंह की अवहेलना तो कर सकते हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन्हें भी मानना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्णय की सार्थक, सकारात्मक आलोचना तो हो सकती है लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि हम इसे मानेंगे ही नहीं, क्योंकि इसके दूरगामी परिणाम होंगे। कल कोई भी यह कह देगा कि मैं सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करूंगा। इससे देश में कानून का राज नहीं रहेगा, अराजकता आ जाएगी, क्योंकि कानून और निर्णय की वैधानिकता की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट करेगा, यह अधिकार संविधान ने उसे दे रखा है।
आगे बढ़ने से पहले इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि पर नजर डालना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने बंद को गैरकानूनी करार दिया। इस निर्णय से किसी की आपत्ति हो सकती है। डीएमके और सीपीएम चाहें तो इस पर पुनर्विचार का आवेदन दे सकते हैं, लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि डीएमके सत्ताधारी पार्टी है। केंद्र में भी वह शासन का अंग है।
इस बात पर ध्यान देना होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले दोनों पक्षों को तीन घंटे तक सुना और तब यह आदेश दिया कि बंद गैरकानूनी है। डीएमके सरकार ने बंद के बजाय भूख हड़ताल का एलान कर दिया, लेकिन व्यावहारिकता में पूरा प्रदेश ठप रहा और जनता को भारी तकलीफ हुई।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र के वरिष्ठ मंत्री टीआर बालू ने सार्वजनिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट पर शर्मनाक, व्यंग्यात्मक टिप्पणी की वह सभी अखबारों में छपी और टीवी पर दिखाया गया। यह अदालत की सीधे अवमानना है। इसके बावजूद अभी तक बालू सरकार में क्यों बने हुए हैं? जबकि मंत्री बनते वक्त यह शपथ ली जाती है कि वह संविधान का पालन करेंगे।
सबसे खेद का विषय यह है कि जिस सेतुसमुद्रम विषय पर सरकार ने स्वयं अदालत से तीन महीने का समय मांगा, उसी मामले पर सरकार का एक घटक उसे लेकर बंद का आह्वान कैसे कर सकता है? इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस की डीएमके को बचाने की साजिश और प्रधानमंत्री की चुप्पी आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है।
इस सारी पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है, तभी न्यायालय के आदेश, अवहेलना और उसकी टिप्पणी के सही मर्म को समझा जा सकता है। अगर न्यायालय में आने वाला हर वादी या समूह न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना का मन बनाए, तो देश में अराजकता को कोई रोक नहीं सकेगा।
जो शासन में है, चाहे व्यक्ति हो अथवा राजनीतिक दल, उनको इस मौलिक बात को समझना होगा कि न्यायालय का निर्णय सभी को मान्य होगा और कानून यह भी कहता है कि गलत निर्णय भी प्रभावी होगा, जब तक कि किसी ऊपरी अदालत द्वारा वह निरस्त नहीं होता अथवा उस पर पुनर्विचार नहीं होता। इस देश की राजनीति के नेताओं को समझना होगा कि भारत के संविधान निर्माताओं ने, जो देश के दूरदर्शी नेता थे, काफी सोच-विचारकर न्यायालय की स्वतंत्रता और सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता को बनाया।
लेकिन आजाद भारत के 60 वर्षो के बाद यह देश न्यायालय के आदेश को न मानने के राजनीतिक षड्यंत्र को बर्दाश्त नहीं करेगा। इसी संविधान में संसद, सरकार और अदालत के रिश्तों की बहुत संवेदनशील व्याख्या भी है। समय के अनुसार यह और भी परिपक्व होता जाएगा। यही भारत के लोकतंत्र की मजबूती भी है।
-लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा के प्रवक्ता हैं।
अभिषेक मनु सिंघवी
भारत का संविधान जिस पर हमें गर्व है, उसकी आत्मा, उसका हृदय और उसकी कें द्रीय विषय वस्तु है- मूलभूत अधिकारों वाला अध्याय। उसमें स्पष्ट रूप से हमारे नागरिकों को सोचने, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। साथ ही साथ संगठन बनाने का भी अधिकार दिया गया है। संगठन या समूह द्वारा असहमति प्रकट करने, हड़ताल करने, कानूनी तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करने के कई हक दिए गए हैं।
इतने स्पष्ट संवैधानिक अधिकारों के होते हुए जाहिर है कि न तो कोई कानून, न कोई संस्थान, न ही विधायिका और न ही न्यायपालिका ऐसे संविधान के मूलभूत हकों को रोक सकता है। हम कोई भी आदेश इस प्रकार नहीं पढ़ सकते कि उसका उद्देश्य इन अधिकारों का उल्लंघन करना हो।
इतना ही नहीं, एक अधिवक्ता की हैसियत से एक सांसद और एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रवक्ता की हैसियत से मुझे यह कहने में झिझक नहीं है कि हम (मैं और मेरी पार्टी) हर उस चीज का समर्थन करते हैं, जो असहमति प्रकट करे। अगर वह प्रक्रिया कानून के अंदर हो, संविधान के अंदर हो।
न्यायपालिका की कार्यवाही के दौरान की गई टिप्पणियां जो उसका अंदरूनी हिस्सा होती हैं, उन्हें तूल देना गलत होगा। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट अपने लिखित आदेशों द्वारा बोलता है। इसलिए अगर कोई लिखित आदेश नहीं आता है, तो हम मानेंगे कि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बोला ही नहीं। यूं भी मामला सबज्यूडिस है। इसका क्या निर्णय होगा हमें पता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने न हड़ताल करने से, न असहमति प्रकट करने से और न ही भूख हड़ताल करने से रोका है और न ही संविधान के अंतर्गत इस तरह की रोक लगाई जा सकती है। ये अलग बात है कि न्यायालय के आदेश के अनुसार देश में दस सालों से बंद प्रतिबंधित है। लेकिन बंद का प्रतिबंधित होना यह जाहिर नहीं करता है कि असहमति व्यक्त करने के लिए भूख हड़ताल या हड़ताल नहीं कर सकते हैं।
इस मामले में असली मुद्दा यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ है, जिसके अंतर्गत ये बात कही जा रही है। हां, इस आदेश के अंतर्गत उल्लंघन हुआ होता अगर सरकार स्वयं प्रदेश की तमाम प्रक्रिया को, सरकारी कामकाज को चलने से रोक दे या बंद कर दे, लेकिन इस मामले में तमिलनाडु की प्रदेश सरकार का स्टैंड बड़ा स्पष्ट है। उन्होंने सरकार की हैसियत से ऐसा कुछ नहीं किया है।
अगर निजी, सामूहिक रूप से विभिन्न व्यक्ति या संस्थाएं किसी मुद्दे पर असहमति प्रकट करते हैं, तो उसको सरकारी बंद समझना गलत होगा। प्रदेश सरकार का पक्ष अभी सुप्रीम कोर्ट के सामने पूरी तरह से रखा नहीं गया है।
मुझे पूरा विश्वास है कि जब प्रदेश सरकार के पक्ष को अदालत के सामने रखा जाएगा, तो सुप्रीम कोर्ट कानून और तथ्यों के तहत यह पाएगा कि उसके आदेश के विपरीत (जो आपत्तिजनक बात है या सरकारी तौर पर बंद करने की बात है), तमिलनाडु में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय या कार्यवाही का इंतजार करना चाहिए और आंतरिक टिप्पणियों के आधार पर कोई राय प्रकट नहीं करनी चाहिए।
कानून और संविधान का विद्यार्थी होने के नाते मेरा यह मानना है कि अनुच्छेद ३५६ के अनुसार राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति बनी है या नहीं, यह संस्तुति सिर्फ केंद्र सरकार कर सकती है और कोई संस्थान या संविधान का अंग यह संस्तुति रिकार्ड नहीं कर सकता। इसलिए ऐसा न्यायिक आदेश कि अमुक प्रदेश में केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लागू करे, न तो आज तक दिया गया है और न ही अनुच्छेद के दायरे के अंदर दिया जाएगा।
-लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता, सांसद व कांग्रेस के प्रवक्ता हैं।