सम्पादकीय. पाकिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव की तारीख करीब आने के साथ जनरल परवेज मुशर्रफ ने भावी सत्ता समीकरणों को अपने मुताबिक ढालने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। नए सेना प्रमुख के रूप में आईएसआई के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल अशफाक परवेज कियानी का मनोनयन और पूर्व प्रधानमंत्री व पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की प्रमुख बेनजीर भुट्टो पर चल रहे भ्रष्टाचार के सभी मामले वापस लिए जाने का फैसला इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
मुशर्रफ ने कियानी का मनोनयन करके यह जताने की कोशिश की है कि वह राष्ट्रपति पद पर पुनर्निर्वाचन के बाद वर्दी उतारने के अपने वादे के प्रति गंभीर हैं, तो बेनजीर पर मुकदमों की वापसी ने उनकी स्वदेश वापसी और सत्ता में भागीदारी का रास्ता खोला है।
इसका मतलब निकट भविष्य में पाकिस्तान में सत्ता के तीन केंद्र होंगे। पहले राष्ट्रपति के रूप में खुद मुशर्रफ होंगे, दूसरे नए सेना प्रमुख जनरल कियानी होंगे और तीसरी होंगी बेनजीर भुट्टो, जो एकमुश्त राजनीतिक समझौते के तहत प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाई जा सकती हैं। इन तीनों के आपसी संबंध वहां की राजनीति का भावी खाका तय करेंगे।
12 अक्टूबर 1999 को रक्तहीन सत्ता-पलट करने के बाद से शासन के सभी सूत्र अपने हाथ में रखने वाले मुशर्रफ ने सत्ता में भागीदारी का यह खाका स्वप्रेरणा से नहीं, बल्कि बढ़ते आंतरिक और बाह्य दबाव, खासकर अमेरिका के दबाव में मजबूर होकर बनाया है।
सेना प्रमुख का पद छोड़ने के बाद उस पर मुशर्रफ का प्रत्यक्ष नियंत्रण तो खत्म हो ही जाएगा, भावी सेना प्रमुख कियानी भी मुशर्रफ की छत्रछाया से निकलने के प्रयास करें तो कोई अनहोनी नहीं होगी।
इतिहास बताता है कि पाकिस्तान की सर्वशक्तिशाली सेना वहां की सत्ता पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण के कोई अवसर खोना नहीं चाहती है, फिर चाहे उसे मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों की मदद से अपने पूर्व प्रमुखों को ही क्यों न अपदस्थ करना पड़ा हो।
1966 में जनरल अय्यूब खान और 1971 में जनरल याह्या खान को सत्ता से बेदखल किया जाना इसका ज्वलंत उदाहरण है। बेनजीर भी कठपुतली प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहेंगी। वे सत्ता के बंटवारे के किसी फामरूले पर तभी सहमत होंगी, जब उन्हें भी समुचित अधिकार मिलें।
इसके अलावा उन्हें जनवरी 2008 में होने वाले आम चुनावों में भी अपना समर्थन दिखाना होगा, जो देश में जेहादी ताकतों के बढ़ते असर के कारण आसान नहीं होगा। ऐसे में पाकिस्तान का भावी राजनीतिक परिदृश्य तमाम संभावनाओं से भरा हुआ है और चूंकि पड़ोसी देश में होने वाली घटनाओं के असर से भारत अछूता नहीं रह सकता है इसलिए वहां के घटनाक्रम पर हमें भी सतर्क नजर रखनी होगी।