उदयपुर. हमें अब अपना गौरवशाली इतिहास पढ़ने-पढ़ाने का प्रयास करना होगा। यह बहुत हो गया कि हम अब तक आक्रमणों, गुलामी की तारीखें पढ़ते रहे और
इसमें अपने आत्म गौरव सुगंध को ही अनुभव नहीं किया।
यह बात प्रसिद्ध इतिहासकार और अभा इतिहास संकलन योजना के महामंत्री डॉ. शरद हेबाळकर ने एक भेंट में कही। प्राचीन भारत के बंदरगाहों, विदेशों में भारतीयों की यात्राओं पर शोध करने वाले डॉ. हेबाळकर ने अब तक जिन देशों में पुरातात्विक उत्खनन हुआ है, वहां किसी न किसी रूप में भारतीयों के प्रभाव को महसूस किया जा रहा है। हमारे यहां यह विषय अति संक्षिप्त रूप से ‘बृहत्तर भारत’ के रूप में पढ़ाया जाता है जबकि यह हमारा एक उज्ज्वल पक्ष है जिससे हमारे पुरखों, सार्थवाहों की विश्व यात्रा, देशों और भूगोल-खगोल की खोजों का पता चल सकता है।
आपातकाल के दौरान बाईस माह तक जब जेल में रहा तो विश्व में भारतीयों की पहुंच और उसके अवशेषों को देखने परखने की इच्छा जागी तो कई देशों की यात्राएं की। इसी क्रम में थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, बर्मा, वियतनाम, मलेशिया आदि की यात्राएं की और वहां प्राप्त भारतीय संस्कृति के अवशेषों को लिखा। मैंने पाया कि वहां जितना था, मैं उससे बहुत कम ही लिख सका।
आज उस इतिहास को पढ़ने-पढ़ाने की जरूरत है न कि पराजित भारतीय मानसिकता का अध्याय। हमने संघर्ष का इतिहास दिया है, इसे समझना होगा। उन्होंने माना कि कई अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देश अभी ऐसे हैं जहां भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अवशेष रहे होंगे। आस्ट्रेलिया में मावरी जनजाति है जो आज भी हाथ जोड़कर प्रणाम करती है, यह निश्चित ही भारतीयता का नमूना है। इस दिशा में बहुत अनुसंधान अभी शेष है। भारत को सच में दुनिया को सभ्यता और संस्कृति का पहला पाठ पढ़ाने का श्रेय है। समिति पुराणों में इतिहास, हिंदू महासागर परिवार योजना जैसे कार्यक्रमों का संचालन कर रही है, आने वाले वक्त में यह हमारी कई धारणाओं को बदलेगी।