दृष्टिकोण. विकासशील और विकसित देशों में सिर्फ संसाधनों का फर्क नहीं होता। फर्क होता है, उस इरादे और संभावनों की तलाश के सभी संभव मौकों को आजमाने का, जो विकसित और विकासशील होने के बीच की बारीक सीमा रेखा को निर्धारित करते हैं।
भारत कई वर्षो से और कई बार दया की भावना से विकासशील देशों में गिना जाता रहा है और जब हमारे आर्थिक विकास की दर 9 से 10 प्रतिशत के ऐतिहासिक दर पर पहुंच गई है तो सबसे बड़ा संकट ऊर्जा यानी कि बिजली का महसूस कर रहे हैं।
दुनिया में भारतीय औद्यौगिक उत्पादनों की जितनी मांग है और भारत की 110 करोड़ से भी ज्यादा जनता को मूलभूत सुविधाओं के साथ रहने के लिए जितनी बिजली की जरूरत है उससे बारह प्रतिशत कम बन रही है।
परंपरागत ऊर्जा स्त्रोत जैसे कोयला और पेट्रोलियम ईंधन अव्वल तो उपलब्ध नहीं हैं और अगर हैं भी तो उनकी वजह से प्रदूषण से लेकर ग्लोबल वार्मिग तक के ऐसे खतरे हैं, जिनसे जीवन को लगातार विपरीत हालत का सामना करना पड़ेगा।
इन दिनों भारत और अमेरिका के बीच हुए परमाणु समझौते के बारे में बड़े जोर-शोर से बात हो रही है। दुर्भाग्य से सारी परिस्थितियों को समझे और परिणामों को ठीक से आंके बगैर अजीबो-गरीब निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं।
इस समझौते का विरोध करने वाले हमारे कुछ मित्र और सिर्फ राम नाम की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी दोनों आश्चर्यजनक रूप से एक ही बात कह रहे हैं कि हमने परमाणु मामलों में अमेरिका की गुलामी स्वीकार कर ली है। ये लोग भूल जाते हैं कि हमें गुलाम बनाने की ताकत दुनिया की किसी भी महाशक्ति में नहीं है।
हम और आप जानते हैं कि इस समय पूरी दुनिया में स्पर्धा चल रही है कि हमारे देश में अधिक-से-अधिक पूंजी निवेश किया जाए। लेकिन जब बिजली ही नहीं होगी तो उद्योग चलेंगे कैसे? औद्योगिकीकरण के बिना हम रोजगार के अवसर कैसे बना पाएंगे?
भारत में साफ-सुथरी परमाणु ऊर्जा का योगदान सिर्फ तीन प्रतिशत है। फ्रांस में अठहत्तर प्रतिशत, जर्मनी में इकतीस प्रतिशत और अमेरिका में बीस प्रतिशत ऊर्जा परमाणु रियेक्टरों से प्राप्त होती है। हमारे सामने एक दिक्कत यह रही थी कि परमाणु बिजली घर चलाने के लिए अच्छी श्रेणी के यूरेनियम का भंडार नहीं है।
जिन देशों के पास भंडार है, उन्होंने एक क्लब बना रखा है और उस क्लब में शामिल हुए बगैर हम अपने देश के विकास के साथ यों ही समझौता करते रहते और कुछ ही वर्षो में कई पीढ़ी पीछे धकेल दिए जाते। मुझे नहीं लगता कि देश को प्रेम करने वाले किसी व्यक्ति को यह विकल्प मंजूर होगा। इसके अलावा दुनियादारी और सामरिकता के हिसाब से भी यह कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है कि कोई देश सिर्फ एक ऊर्जा स्त्रोत पर निर्भर रहे।
भारत में परमाणु ऊर्जा का पूरा ढ़ांचा मौजूद है, ऐसे वैज्ञानिक हैं जो भारत में अवसर न होने के कारण दूसरे देशों में परमाणु ऊर्जा के कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं। कमी है तो सिर्फ यूरेनियम की, जिसे अमेरिका के साथ भारत की शर्तो पर हुए समझौते में पूरा करने की कोशिश की है।
इसके अलावा एक बात पर किसी की नजर नहीं जाती कि पिछले तीस साल से भारत को परमाणु बिरादरी से अलग-थलग रखने का जो खगोलीय षड़यंत्र चल रहा था, वह 1-2-3 समझौते से अपने आप खत्म हो गया है।
अमेरिका की संसद ने अपनी ओर से 1959 में बने परमाणु ऊर्जा कानून की धारा 123 में संशोधन किया और भारत को इसकी छूट दिलाने का प्रस्ताव पारित किया। यह कानून हाइड एक्ट है, जिसे लेकर बहुत नगाड़े पीटे जा रहे हैं कि इससे भारत की संप्रभुता में अमेरिका की दखलंदाजी बढ़ेगी।
जिन लोगों ने हाइड एक्ट पढ़ा है, वे जानते हैं कि यह एक्ट सिर्फ अमेरिकी प्रशासन को सलाह दे सकता है, किसी भी तरह किसी भी देश को और खास तौर पर भारत को अपनी परमाणु नीतियां बदलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
1-2-3 समझौता सिर्फ और सिर्फ परमाणु तकनीक और यूरेनियम उपलब्ध कराने का एक दो तरफा करार है और सिर्फ 2014 तक भारत खुद अपने द्वारा तय किए गए परमाणु बिजलीघरों यानी रियेक्टरों को अमेरिका की नहीं अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की सुरक्षा निगरानी के तहत रखने पर राजी हुआ है।
यह समझौता सिर्फ नागरिक परमाणु उद्योग एवं ऊर्जा का समझौता है और इससे एक तो हमें अपनी मर्जी से सुरक्षा के लिए परमाणु परीक्षण करने पर कोई रोक नहीं है और दूसरे हम उस गौरवशाली समाज में शामिल हो गए हैं, जहां हम दुनिया की बड़ी-से-बड़ी ताकत से आंख से आंख मिलाकर बात कर सकते हैं।
अगर हमें अपनी आर्थिक विकास दर बनाए रखनी है, अगर अपने खेतों को हरा-भरा देखना है, अगर नौजवानों और आम आदमी के चेहरों पर मुस्कान देखनी है, अगर हमें पूरी दुनिया से मुकाबला करना है तो यह समझौता हमारे लिए दुर्लभ अवसर लेकर आया है। अभी हम 1 लाख 32 हजार मेगावाट बिजली पैदा करते हैं, 2012 तक 2 लाख का लक्ष्य है और 2020 तक हम 5 लाख मेगावाट बिजली पैदा करने की स्थिति में होंगे।
हमारे पड़ोसी देशों की जो प्रतिक्रिया है, वही इस समझौते का महत्व बताती है। चीन कहता है कि भारत को परमाणु शक्ति की मान्यता देने से एशिया में शक्ति संतुलन गड़बड़ाएगा। पाकिस्तान अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के पीछे हाथ धोकर पड़ा है कि जैसा समझौता भारत के साथ किया गया है वैसा ही उसके साथ किया जाए।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के नाते देश की तस्वीर बदलने की जो प्रक्रिया शुरू की थी, वह अब 1-2-3 समझौते के बाद एक निर्णायक पड़ाव पर आ गई है। उद्योग-व्यापार के अलावा दैनिक जीवन में जो परिवर्तन बहुत जल्दी ही अनुभव किे जाएंगे, उनके बाद सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने वालों की बोलती बंद हो जाएगी।
समझौता अमेरिका से हुआ है और अगर विरोध का यही कारण है तो विरोध करने वाले दूकरा विकल्प पेश करें। विश्व जानता है कि मैंने अमेरिका का डब्लूटीओ में कृषि क्षेत्र के समझौते के मुद्दे पर लगातार खुलकर विरोध किया है।
जिन लोगों को भारत की संप्रभुता और स्वायत्तता के लिए खतरा नजर आ रहा है, वे इस देश का, इसके संविधान का और इसकी जनता का अपमान कर रहे हैं। आजादी की कीमत कांग्रेस से ज्यादा कोई नहीं जानता। आइये हम सब मिलकर विकास की राह में आगे बढ़ें।
लेखक केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री हैं।