अभिमत. अपराधियों को जेल भेजे जाने के मायने आजकल बदल चुके हैं। जो ‘ताकतवर’ मुजरिम जेल में सजा काट रहे होते हैं उनके लिए जेल अभयारण्य से कम नहीं रहे। नाम के लिए भले ही वे बंदी रहते हैं मगर जेल अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से उन्हें हर वह सुविधा कारावास में उपलब्ध होती है जो बाहर रहने पर वे भोगते हैं। कारागृह से उनका ‘कारोबार’ भी बेरोकटोक चलता रहता है।
रविवार को उत्तरप्रदेश की 60 जेलों में मारे गए छापों में कैदियों के पास मोबाइल फोन, चार्जर, लाइटर, चाकू और अन्य प्रतिबंधित सामान की बरामदगी की खबर से शायद ही किसी को ताज्जुब हुआ हो। जेल के भीतर से माफिया गैंग संचालित होने की शिकायतों के बाद मारे गए छापों के दौरान कुछ जेलों में बाहरी व्यक्ति भी पकड़े गए।
इनके अंदर जाने के बारे में प्रवेश रजिस्टर में कोई जानकारी नहीं थी, न ही ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी इसका कोई कारण ही बता सके। पुलिस द्वारा खासी भागदौड़ और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बाहुबली अपराधियों को सजा सुनाया जाना मुमकिन हो पाता है।
जेल महकमे में गहराई तक व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण इस कवायद से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है और सजा अर्थहीन हो चुकी है। हैरत की बात यह है कि कई मौकों पर ऐशगाह के रूप में जेलों के इस्तेमाल के मामले सामने आने के बावजूद आज तक किसी अधिकारी या कर्मचारी को गंभीर सजा मिलने के बारे में नहीं सुना गया।
यही कारण है कि यह मर्ज दिन-ब-दिन बढ़कर लाइलाज होता जा रहा है और मुजरिमों के मन में जेल की हवा खाने का कोई खौफ नहीं है। राजनीति में अपराधियों का बढ़ता दबदबा भी इन हालात के लिए जिम्मेदार है। बढ़ते अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए फिक्रमंद राज्य सरकारों को सुनिश्चित करना होगा कि जेल का मतलब जेल ही हो।