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इस्लाम से दूर हो रहा है मुसलमान?

दृष्टिकोण.salim इंच, फुट, गज, फर्लाग और किलोमीटर से फासले नापे जाते हैं। कुछ लोग आइंस्टीन पर यकीन करते हुए फासलों को समय से मापते हैं। मसलन अवंतिका एक्सप्रेस मुंबई सेंट्रल से इंदौर 14 घंटे में पहुंचती है या हवाई जहाज दिल्ली से न्यूयार्क व्हाया फ्रैंकफर्ट 18 घंटे में पहुंचता है। छुट्टियों में घर लौटते जवान को फासले लंबे लगते हैं। जीरो पर आउट होने वाले खिलाड़ी को पैवेलियन का सफर जानलेवा लगता है।

कुछ फासले ऐसे होते हैं जिन्हें नापने के लिए कोई पैमाना मुकर्रर ही नहीं हो पाता। सबसे खतरनाक फासले दिल और दिल के बीच बन जाते हैं और इससे भी खतरनाक एक फासला है जो आदमी खुद तक पहुंचने में महसूस करता है। कई बार इस फासले को तय करने में पूरी उम्र लग जाती है। आतंकवाद की जड़ में यही फासला मौजूद है। अफसोस की बात है कि आज मुसलमान का इस्लाम से फासला बढ़ गया है।muslim

आज लोग इस्लाम के नाम पर एक बेमकसद जंग लड़ रहे हैं। शायद दूसरे तमाम मजहबों में भी कम या ज्यादा परंतु फासला तो बन ही गया है। शायद इसलिए कोई किसी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। यह अजीब बात है कि इन फासलों ने फैलकर पूरी दुनिया के अमन को खतरे में डाल दिया है, जबकि सारे मजहबों का मकसद अमन कायम करना है।

साफ हिदायत है कि ‘दूसरे मजहब को मानने वालों से विवाद मत खड़ा करो और अगर बहस करना भी हो, तो वह बहुत मोहब्बत के साथ की जाए। हम अपने उसूलों और हिदायतों पर यकीन करते हैं और सभी को यह हक है कि वे अपने मजहब को माने क्योंकि हमारा खुदा और अन्य मजहब मानने वालों का खुदा अलग-अलग नहीं है। हम सारे इंसान एक ही खुदा के बंदे हैं।’ (सूर: अनकबूत)

कुरान शरीफ की उक्त आयत को मानने से इनकार करने वाले लोग कौन हैं? और क्यों इनकार करते हैं? ये ही लोग ऐसे व्यक्ति के खिलाफ फतवा जारी करते हैं, जो सभी मजहबों की इज्जत करते हुए अपने मजहब का पालन करता है।

इस तरह का फतवा देने वालों से पूछा जाए कि क्या वे नौशाद, मोहम्मद रफी, शकील बदायूंनी और साहिर के खिलाफ फतवा देंगे जिन्होंने हिंदुस्तानी सिनेमा के लिए कमाल के भजन बनाए। क्या बिस्मिल्ला खां को आप मुसलमान नहीं मानेंगे क्योंकि उन्होंने ताउम्र मंदिर में बैठकर शहनाई का रियाज किया? कहां-कहां और किन-किन लोगों को आप खारिज करेंगे।

आज कई लोग इस्लाम की गलत तस्वीर पेश कर रहे हैं। काफिर शब्द सबसे अधिक गलत इस्तेमाल हो रहा है। दरअसल काफिर शब्द फारसी के कुफ्र से बना है जिसके मायने हैं उजाले को रोकना, इल्म को रोकना, सच्चाई को रोकना। बिना लफ्ज के मायने जाने ही कितने लोग गलतबयानी कर रहे हैं। आमतौर पर गैर मुस्लिम को काफिर कहने की गलती की जा रही है। सभी लोग हिंदुस्तान हुकूमत करने नहीं आए। अनगिनत सूफी लोग यहां इल्म हासिल करने आए और जो अपने पास था वह देने आए।

इस्लाम का आदर्श यह भी रहा है कि जब आपका पड़ोसी आपके साथ रहने में महफूज महसूस करे तब आप खुदा के सच्चे बंदे माने जाते हैं। सख्त अफसोस है कि कुछ लोग इस्लाम की दुहाई देने का नाटक करते हुए इस्लाम की हिदायतों के खिलाफ जाकर पूरी इंसानियत के दुश्मन बन रहे हैं। बैहाकी: किताब अल ईमान: शुआब अल ईमान ‘सभी इंसान खुदा का खानदान है और खुदा सबसे अधिक उसे प्यार करता है जो खुदा के बंदों को प्यार करता है।’

खुदा की बनाई कायनात से नफरत करके खुदा का प्यार हासिल कर पाना कैसे मुमकिन है। फिल्मों के संपादन की मशीन (स्टीनबैक) पर आप सीन को मनचाही स्पीड से आगे-पीछे ले जा सकते हैं क्योंकि इस मशीन पर सिगरेट से निकले हुए धुएं को मुंह में वापस जाते हुए देख सकते हैं। काश! जीवन में भी इसी तरह घटनाओं को आगे-पीछे ले जाने की सहूलियत होती।

कल्पना कीजिए कि इंग्लैंड के ग्लासगो एयरपोर्ट पर मानव बम सहित कार ले जाने वाले शख्स को हम दस गज पहले रोक पाते और पूछ पाते कि आप यह काम क्यों कर रहे हैं। आप जिस भीड़ को खत्म करना चाहते हैं, उसमें न बुश मौजूद है, और न ब्लेयर खड़े हैं। आपकी हरकत का शिकार आम आदमी होंगे, उसी तरह के आम आदमी जो आपके परिवार में भी मौजूद हैं।

वह व्यक्ति यकीन से कोई जवाब नहीं दे पाता क्योंकि साफ सोचने वाला आदमी ही यकीन से जवाब देता है। आज का आतंकवाद तवारीख की सबसे खतरनाक जंग है और इसमें पढ़े-लिखे लोग भी शामिल हैं। इस्लाम में खुदकुशी को बहुत बड़ा गुनाह बताया गया है। क्या मानव बम बनने वाले गुमराह लोगों को इस हिदायत की जानकारी है?

अखबार में खबर थी कि मुंबई के हरे राम हरे कृष्ण मंदिर से खाना माहिम के यतीमखाने में भेजा जाता था। यतीमखाने की देखरेख करने वाले ने यह कहकर खाना लौटा दिया कि पूजा किया हुआ खाना मुस्लिम बच्चों को नहीं दिया जा सकता। अजीब जहालत है।क्या पूजा या इबादत करने से अनाज का असर बदल जाता है? या उससे भूख नहीं मिटती?

हम भी तो फातेहा पढ़कर खाना गरीबों में बंटवाते हैं। इस्लाम की असली लड़ाई भूख और जहालत है। कुछ लोग पीपल की पूजा करते हैं तो क्या उस दरख्त के साए में बैठने के खिलाफ फतवा जारी किया जा सकता है? अहमद अबू दाऊद की हदीस है, ‘ओ मेरे खुदा और कायनात की तमाम चीजों के मालिक मैं कबूल करता हूं और एतबार करता हूं कि सभी इंसान एक-दूसरे के भाई हैं।’

कुछ दिन पहले मैंने अखबार में पढ़ा था कि कुछ मुसलमानों ने तय किया है कि वे कुरान और हदीस के सच्चे मायनों को जाहिर करेंगे और इस्लाम की सच्ची तस्वीर सामने लाने की कोशिश करेंगे। ये मुट्ठी भर लोग आतंकवाद के खिलाफ जेहाद करेंगे। मेरी दुआ है कि इस तरह की कोशिश कामयाब हो। इस तरह की चिंगारी आग में तब्दील हो सकती है। मैंने अपनी फिल्म ‘पत्थर के फूल’ में एक संवाद लिखा था कि पहाड़ पर जलाए दीये से अंधेरा भले ही दूर न हो, मगर रोशनी दूर से नजर आती है।

बुखारी तिरम्जि, नसाई के मुताबिक ‘खुदा का सच्चा बंदा वह है जिससे किसी और की जायदाद और जान को कोई जोखिम न हो। वह खुदा का सच्चा बंदा नहीं है जिससे उसका पड़ोसी खौफ खाता है और खुद को महफूज नहीं समझता।’ अब बताइए कि सबकी हिफाजत और सलामती की दुआ करने वाले मजहब की कितनी गलत तस्वीर पेश की जा रही है!

-लेखक जाने-माने फिल्म निर्माता व पटकथाकार हैं।





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