सम्पादकीय. एटमी करार को लेकर यूपीए सरकार और वाम दलों के बीच चल रही तकरार के मद्देनजर मध्यावधि चुनाव अब और करीब नजर आने लगे हैं। यूपीए व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का ताजा बयान, वाम दलों की सरकार को धमकी और कर्नाटक का राजनीतिक घटनाक्रम सभी इस बात का संकेत करते हैं कि देश के प्रमुख राजनीतिक दल चुनावी तैयारियों में जुटे हुए हैं।
हालांकि कोई भी दल मध्यावधि चुनाव की नौबत आने की जिम्मेदारी खुद पर नहीं लेना चाहता है, फिर भी व्यावहारिक राजनीति का ककहरा समझने वाला भी बता सकता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा।
तय है कि इसका ठीकरा वाम दलों के सिर ही फूटेगा, जो एटमी करार की वजह से भारत पर अमेरिका का दबदबा बढ़ने की संभावना से बिफरे हुए हैं। वे इस जमीनी सच्चई को जान-बूझकर भूल रहे हैं कि अपने गढ़ो -प. बंगाल, केरल और त्रिपुरा के बाहर उनकी जड़ें बिलकुल भी नहीं हैं और अपने गढ़ों में भी उनकी स्थिति बेहतर होने के कोई आसार नहीं हैं।
मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा की भोपाल में हुई कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी नेताओं का सारा जोर चुनावी तैयारियों पर ही था। यह अलग बात है कि चुनाव किसके नेतृत्व में लड़े जाएंगे, इस सवाल को लेकर भाजपा की ऊहापोह अब तक दूर नहीं हुई है।
पिछले महीने कांग्रेस महासचिव पद पर नेहरू-गांधी वंश के चिराग राहुल गांधी की ताजपोशी के साथ देश की सबसे पुरानी पार्टी ने भी चुनाव की तैयारी का संकेत दे दिया था। उसके तत्काल बाद से केंद्र सरकार ने लोक-लुभावन घोषणाओं का जो सिलसिला शुरू किया, उससे भी चुनाव की अटकलों को बल मिला। अब सोनिया गांधी ने यह कहकर कि अगर चुनाव की नौबत आती है तो हम इसके लिए तैयार हैं, चुनाव की दिशा में एक कदम और बढ़ा दिया है।
यह अजीब संयोग है कि कोई भी प्रमुख पार्टी मध्यावधि चुनाव चाहती नहीं है। फिर भी वे उसकी तैयारी में जुटे होने का आभास दे रही हैं। तमाम चुनाव सर्वेक्षणों के नतीजे बताते हैं कि आज की तारीख में चुनाव होने पर एक बार फिर त्रिशंकु लोकसभा ही चुनी जाएगी।
ऐसे में सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे गठबंधन की राजनीति की सीमाओं को समझें और देश की जनता पर असमय चुनाव थोपे जाने से बाज आएं। यदि संभावित मध्यावधि के बाद भी त्रिशंकु लोकसभा बनती है तो चुनाव की सारी कवायद व्यर्थ जाएगी ही, राजनेताओं पर मतदाताओं का भरोसा और कम हो जाएगा। काश, यह नौबत नहीं आए।