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क्या ऐश्वर्या बच्चन जया की तरह हैं?

परदे के पीछे.aishwarya rai‘शोले’ के फिल्मकार रमेश सिप्पी के सुपुत्र रोहन सिप्पी ने कुछ वर्ष पूर्व अपने बालसखा अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के साथ एक फिल्म बनाई थी। विगत वर्ष रोहन ने श्रीराम राघवन के निर्देशन में जॉन अब्राहम और ऐश्वर्या के साथ ‘हैप्पी बर्थ-डे’ नामक फिल्म बनाने की घोषणा की थी, जिसे पटकथा में कमी पाए जाने के कारण रद्द कर दिया गया। अब रोहन उसी निर्देशक के साथ पहले दी गई अनुबंध राशि के तहत जॉन और ऐश्वर्या के साथ एक प्रेमकथा बनाना चाहते हैं, लेकिन बच्चन परिवार की नई-नवेली बहू कुछ गहरे प्रेम दृश्यों के कारण यह फिल्म नहीं करना चाहतीं। इस तरह की फिल्म वह अपने पति अभिषेक के साथ करना चाहती हैं। बेचारे रोहन परेशान हैं, क्योंकि नवंबर में जॉन से लिया गया समय वे नायिका के अभाव में खोना नहीं चाहते। जनवरी 2008 के बाद जॉन अब्राहम उन्हें वर्ष भर उपलब्ध नहीं हो पाएंगे। अत: रोहन बोस्टन रवाना हो चुके हैं, जहां ऐश्वर्या अमेरिकी फिल्म ‘पिंक पैंथर’ की शूटिंग कर रही हैं।

ज्ञातव्य है कि विगत माह ऐश्वर्या ने करन जौहर की फिल्म करने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह दो पुरुषों के बीच फंसी स्त्री की कहानी थी। अब बच्चन परिवार की बहू बनने के बाद ऐश्वर्या साफ-सुथरी भूमिकाएं ही करना चाहती हैं। गोयाकि आप उनके साथ मदर टेरेसा या सती अनुसुइया बना सकते हैं। अब उनके साथ ‘कजरारे’ मुमकिन नहीं है। ऐश्वर्या की इस इच्छा का आदर किया जाना चाहिए, परंतु व्यवहार के दोहरे मानदंड से उन्हें भी बचना चाहिए। क्या ‘पिंक पैंथर’ में वे बुरके में प्रस्तुत हैं या ‘जोधा-अकबर’ में उन्होंने रितिक के साथ रोमांटिक दृश्य नहीं किए हैं या फिर बेन किंग्सले की ‘मुमताज’ बनकर वे पर्दानशीं रहेंगी? गोयाकि डॉलर सिनेमा के लिए कुछ नियम हैं और रुपया सिनेमा के लिए अलग नियम हैं। नियमों की तराजू का झुकाव डॉलर वाले हिस्से की ओर ज्यादा है। सारे नीति-नियम अर्थशास्त्र ही तय करता है।

आजकल की फिल्मों में शरीर प्रदर्शन की अपनी मांग है। ऐसे में ऐश्वर्या को चाहिए कि वे अपनी सास जया की तरह कुछ वर्षो के लिए फिल्मों से दूर चली जाएं। यह बात अलग है कि जब जया ने अभिनय से छुट्टी ली थी, तब उनके पति शिखर सितारा हो गए थे, जो अभी तक संघर्षरत अभिषेक नहीं हुए हैं। लाइम लाइट की चकाचौंध से दूर रहकर गृहस्थी के श्याम-श्वेत को साधना आसान नहीं होता।

दरअसल आधुनिक जीवन में प्रतियोगिता को गुणवत्ता और गहराई से ज्यादा महत्व देने के कारण हम साधन और साध्य के अंतर को भूल चुके हैं। अब बच्चन परिवार इतना संपन्न है कि सभी सदस्य अपने मनचाहे काम को इत्मीनान के साथ करने के लिए स्वतंत्र हैं। कहीं कोई आर्थिक दबाव नहीं है। अच्छे, स्वस्थ और सार्थक अवसरों का इंतजार घर बैठकर किया जा सकता है।

कहते हैं कि धरती संसार के सभी मनुष्यों का पेट भर सकती है, परंतु लालच को संतुष्ट नहीं कर सकती। स्टीवन स्पिलबर्ग ने पुत्र के जन्म के बाद पांच वर्ष तक काम नहीं किया, क्योंकि यह दिव्य समय वह अपने बेटे के साथ गुजारना चाहते थे। बच्चा जब पहला कदम लेता है, तो उसके माता-पिता के लिए वह दिव्य क्षण होता है। क्या कोई भी पिता इस दिव्य क्षण को खोना चाहेगा? अब ऐसे क्षणों में आप डॉलर कूटने में लगे हैं, तो क्या किया जा सकता है। यह बात सितारों तक सीमित नहीं है। हम किसी भी क्षेत्र में देखें, तो पाएंगे संतोष या गहराई कहीं दिखाई नहीं देती।

विरोधाभास यह है कि आज टेक्नोलॉजी ने ऐसा संसार रचा है कि आप मजे से उसे भोग सकते हैं। हालांकि भागमभाग आपको साधन तो जुटाने देती है, परंतु उसका आनंद नहीं लेने देती।





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