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जयपुर के भूवैज्ञानिक ने बदला भारत का भूगोल

जयपुर. राजस्थान विवि की रिसर्च टीम ने भारत की 80 करोड़ साल पहले की वास्तविक भौगोलिक स्थिति की जानकारी जुटाई है, जिससे यह धारणा गलत साबित होती है कि भारत उस समय ऑस्ट्रेलिया-अंटार्कटिका के साथ ‘गोंडवाना’ जोन में था।

राजस्थान विवि में जियोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रो. एमके पंडित के नेतृत्व में किए गए शोध में पता चला है कि भारत की भौगोलिक स्थिति चलायमान रही है। उस समय उसका अलग अस्तित्व था। इस शोध को नार्वे में 21 से 24 सितंबर तक हुई अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में दुनियाभर के भूवैज्ञानिकों ने मान्यता दी।

विश्व भूगोल के विद्यार्थियों को यही पढ़ाया जाता है कि भारत पहले गोंडवाना जोन का एक हिस्सा था, जो कालांतर में अलग हुआ। पंडित की टीम में नार्वे के सर्वे भूवैज्ञानिक प्रो.टास्र्विक, दक्षिण अफ्रीका के विट्स विवि के प्रो.एशवाल और फ्लोरिडा विवि के प्रो.जोजफ मर्ट भी शामिल थे।

पंडित ने बताया कि अब तक प्रचलित धारणा केवल विदेशों में हुए वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित थी। विश्व भूवैज्ञानिक यह तो मानते थे कि भारतीय भूभाग गोलार्ध में सबसे चलायमान है, लेकिन अध्ययन के लिए कभी यहां का रुख नहीं किया गया। यही कारण था कि हमें इस प्रचलित धारणा के बारे में शक हुआ और हमने जालोर-बाड़मेर की चट्टानों को सवरेत्तम विकल्प मान नए सिरे से खोज शुरू की।

हालांकि विश्व की करीब 330 करोड़ वर्ष पुरानी ‘ग्रेनाइट नाइसिस’ चट्टानें उदयपुर संभाग में हैं, लेकिन भूवैज्ञानिकों ने जालोर-बाड़मेर और जोधपुर, सिरोही में फैली चट्टानों को अध्ययन के लिए चुना। ये करीब 70 करोड़ वर्ष पुरानी बताई जाती हैं, जो भारतीय भूभाग की 80 करोड़ वर्ष पूर्व की स्थिति को जानने के लिए अनुकूल थीें। अध्ययन के लिए भूवैज्ञानिकों को संबंधित चट्टान की सही आयु और इसके पुराचुंबकीय गुणों की सही जानकारी एकत्र की गई।

शोध के नतीजों में भारतीय भूभाग 40 डिग्री उत्तर में होना बताया गया है, जो अब तक विश्व गोलार्ध में 30 डिग्री उत्तर में स्थित बताया जाता था। शोध में जालोर-बाड़मेर की चट्टानें 75-77 करोड़ वर्ष पुरानी होने के पुख्ता प्रमाण पहली बार मिले।

>> -रिसर्च के नतीजों को नार्वे में स्वीकार किया जा चुका है। अब राजस्थान में हुई इस रिसर्च के बाद इसके नतीजों को ध्यान में रखकर सही जानकारी जुटाई जा सकेगी। इससे राजस्थान में रिसर्च कर रहे लोगों को भी नया उत्साह मिलेगा।
-डॉ. यू.बी. माथुर, रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर जनरल, जीएसआई

अब तक प्रचलित धारणा
विश्व भूगोल के दक्षिणी गोलार्ध में 55 करोड़ साल पहले भारत-ऑस्ट्रेलिया-अंटार्कटिका एकसाथ जुड़े हुए थे। इसे भूवैज्ञानिकों ने ‘गोंडवाना’ नाम दिया।
80 करोड़ साल पहले दुनिया के सभी भूभाग विशाल महाद्वीप की तरह जुड़े हुए थे। इसे ‘रूडिनिया’ कहा गया। इसमें भी गोंडवाना के समूह को एकसाथ जुड़ा हुआ माना गया।
विश्व के एक ग्रुप विशेष के भूवैज्ञानिकों ने 130 करोड़ वर्ष पूर्व के गोंडवाना ग्रुप के एकसाथ होने की बात कही थी। इस पर शोध अभी जारी है। राजस्थान में हुए नए रिसर्च ने इन सभी तथ्यों को सिरे से खारिज कर दिया है।

>> रिसर्च के नतीजों को नार्वे में स्वीकार किया जा चुका है। अब राजस्थान में हुई इस रिसर्च के बाद इसके नतीजों को ध्यान में रखकर सही जानकारी जुटाई जा सकेगी। वहीं राजस्थान में रिसर्च कर रहे लोगों को भी नया उत्साह मिलेगा।
डॉ. यू.बी. माथुर, रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर जनरल, जीएसआई





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