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बेहतर मानसून के बाद भी कृषि उत्पादन में छलांग मुश्किल

pawarमुंबई: दक्षिण पश्चिम का मानसून सीजन अब समाप्ति की ओर है और देश में कमोबेश मानसून बेहतर रहा है। इसके बावजूद हम कृषि उत्पादन में बड़ी छलांग नहीं लगा पा रहे हैं तो उसका कारण मानसून की विफलता नहीं है। भारत को कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए मानसून पर अत्यधिक निर्भरता खत्म करनी होगी।

भारतीय महाद्वीप में मानसून कुछ दिन और लंबा खिंचने के बावजूद बेहतर रहा है। खरीफ का आकलन मिला-जुला कहा जाना चाहिए। कृषि मंत्रालय के पूर्वानुमान बताते हैं कि खरीफ 2007 में खाद्यान्न का उत्पादन 11.42 करोड़ टन से करीब 20 लाख टन पीछे है। तिलहन का उत्पादन 161.30 लाख टन होने का अनुमान है, हालांकि लक्ष्य 185.0 लाख टन था। कॉटन और गन्ने की फसल बेहतर बताई जा रही है। इसका उत्पादन रिकार्डतोड़ होने की उम्मीद है। चावल के मामले में फसल 8 करोड़ टन के स्तर पर ठहरने की उम्मीद है। नकदी फसलें खरीफ में अच्छा उत्पादन कर सकती हैं।

फिलहाल 36 मौसम सबडिवीजन में से 30 में सामान्य या अत्यधिक बारिश हुई है। यह 2006 के मुकाबले बेहतर है। करीब 500 जिलों में से 72 फीसदी में बौछारें आई हैं। सितंबर में खत्म होने वाले चार माह में देखा जाए तो जहां 164 जिलों में अत्यधिक बारिश हुई है, वहीं 205 जिलों में सामान्य बारिश रही है।

जून और सितंबर में बारिश 19 फीसदी और 18 फीसदी रही है, जो इन महीनों में सामान्य बारिश के आंकड़े से ज्यादा है। हालांकि यह उम्मीद करना कि पूरे देश में बारिश अच्छी रहनी चाहिए, कुछ ज्यादा ही माना जाएगा।

यह अलग बात है कि प्रकृति की इस मेहरबानी के बाद भी हम कृषि उत्पादन में लंबी छलांग नहीं लगा पा रहे हैं। भारतीय कृषि मानसून पर काफी निर्भर होती है, लेकिन अनाज का 50 फीसदी उत्पादन बिना सिंचाई के होता है। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए मानसून पर निर्भरता खत्म करने के लिए वाटरशेड मैनेजमेंट पर आधारित रणनीति बनानी चाहिए।





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