अभिमत. उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम की पहली बरसी पर लखनऊ में संपन्न ‘सावधान रहो, आगे बढ़ो’ महासम्मेलन में अपने राजनीतिक सपने का साफगोई से खुलासा कर दिया है। देश के सबसे बड़े प्रदेश में स्पष्ट बहुमत से बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनाने वाली मायावती को अब दिल्ली भी करीब नजर आने लगी है।
उन्हें लगने लगा है कि राजनीतिक अनिश्चितता के मौजूदा दौर में उनकी बहुजन समाज पार्टी के लिए दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना मुश्किल काम नहीं है। मायावती के पूर्ववर्ती मुलायम सिंह को भी जब-तब दिल्ली के सपने आते रहे हैं और पड़ोसी राज्य बिहार में 15 बरस राज करने वाले लालूप्रसाद यादव भी ऐसे सपने देखते रहे हैं। इन्हीं सपनों की बदौलत दोनों ने दिल्ली की सत्ता में साझेदारी पाई भी।
इसलिए मायावती को भी पूरी दिल्ली भले ही न मिले, वहां की सत्ता में हिस्सेदारी तो मिल ही सकती है लेकिन यह हिस्सेदारी पाने के लिए मायावती को अपनी वाणी और तौर-तरीकों में थोड़ा बदलाव तो लाना ही होगा। हर समय कर्कश वाणी का प्रयोग करने और आक्रमण की मुद्रा अपनाए रहने की उनकी कार्य-शैली अच्छा संदेश नहीं देती है।
बसपा के भीतर मायावती के खिलाफ भले ही कोई आवाज उठाने का साहस नहीं करे, पर अपने राजनीतिक विरोधियों को कड़वा बोलने के मौके वे खुद-ब-खुद उपलब्ध कराती हैं। मायावती पूर्व में भाजपा, सपा और कांग्रेस सभी के साथ राजनीतिक गठजोड़ कर चुकी हैं और इन सभी पार्टियों के अनुभव कड़वाहट भरे रहे हैं।
‘सावधान रहो, आगे बढ़ो’ महासम्मेलन में भी उन्होंने किसी को नहीं बख्शा, जबकि दिल्ली हासिल करने के लिए उन्हें इनमें से किसी न किसी के साथ तो हाथ मिलाने ही होंगे। मायावती को समझना होगा कि उत्तरप्रदेश की विशेष परिस्थितियों में टकराव की राजनीति के जरिये सत्ता हासिल करना अलग बात है पर इसी रास्ते को अपनाकर दिल्ली नहीं जीती जा सकती है।