दृष्टिकोण.
कांग्रेस द्वारा चुनाव का सामना करने संबंधी डींगें हांकने के बीच पार्टी के भीतर घबराहट की एक लहर ऐसी भी है जो शायद वैसे निर्बाध ढंग से नहीं बह रही है जैसा पार्टी के आका चुनावी सर्वेक्षणों पर भरोसा कर कह रहे हैं।
कांग्रेसी इसके लिए २00४ के चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों का हवाला देते हैं, जहां तकरीबन सभी सर्वेक्षणों में भाजपानीत एनडीए गठबंधन की आसान जीत की भविष्यवाणी की गई थी, लेकिन वास्तविक नतीजे कुछ और ही रहे थे। वे निजी तौर पर यह मानते हैं कि जल्दी चुनाव होने से उनका संसदीय कैरियर छोटा हो सकता है।
राहुल गांधी को पार्टी में महासचिव बनाने से कुछ ही लोग उत्साहित हुए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तरप्रदेश में हुए पिछले विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी में जान फूंकने और मतदाताओं को लुभाने के लिए राहुल गांधी को मसीहा के तौर पर उतारा गया।
इसके बावजूद पार्टी को वहां करारी पराजय झेलनी पड़ी। हालांकि कोई भी उत्तरप्रदेश में नाटकीय परिवर्तन की उम्मीद नहीं कर रहा था लेकिन ज्यादातर कांग्रेसियों को लगता था कि राहुल के आने से कुछ असर जरूर पड़ेगा।
जब पार्टी में पुनरावलोकन का समय आया, तो सलमान खुर्शीद को बलि का बकरा बना दिया गया, लेकिन राहुल गांधी पर किसी ने अंगुली तक नहीं उठाई। इसकी बजाय उन्हें महासचिव बना दिया गया। यह कुछ-कुछ वैसा ही हो रहा है जिस तरह उनके पिता राजीव गांधी को दादी इंदिरा गांधी ने महासचिव के जरिए सीधे शीर्ष पर पहुंचा दिया था।
राहुल और प्रियंका के बीच यदि देखा जाए तो लोगों को प्रियंका पर कहीं ज्यादा भरोसा है और वे उनमें दादी इंदिरा गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व की छवि देखते हैं। लेकिन जहां प्रियंका ने अपने भाई की खातिर राजनीति से दूरी बनाए रखी, राहुल ने अपने शुरुआती राजनीतिक कैरियर में कुछ खास नहीं किया।
हालांकि यह तो सभी मानते हैं कि राहुल की पहली लड़ाई के लिहाज से उत्तरप्रदेश की जंग बेहद कठिन थी, लेकिन गुजरात की चुनौती भी कुछ कम नहीं होगी। नरेंद्र मोदी जनता को उकसाने में माहिर चतुर रणनीतिकार हैं और वे चुनाव अभियान के दौरान राहुल की जरा सी चूक का भी फायदा उठाने से बिलकुल नहीं चूकेंगे।
वैसे यह अंदाज लगाना औचित्यपूर्ण है कि सत्ता-विरोधी कारक मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और संभवत: गुजरात जैसे भाजपा शासित राज्यों में कांग्रेस के पक्ष में जा सकते हैं, जहां यह दूसरे नंबर की पार्टी है लेकिन यूपीए के सहयोगी दलों के लिए कांग्रेस के जरा से फायदे के कारण बहुत कठिनाई पैदा हो सकती है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि बिहार में नीतीश कुमार ने अपनी पूर्ववर्ती राबड़ी देवी(जो केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की प्रतिनिधि थीं) की अपेक्षा कहीं बेहतर प्रशासन दिया है। लालू लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की आशंका से इसलिए डरे हुए हैं क्योंकि वर्ष २00४ में तो उन्हें प्रभावी ढंग से २४ सीटें मिल गई थीं लेकिन इस वक्त उनका यह आंकड़ा शायद दहाई तक भी न पहुंचे।
तमिलनाडु में द्रमुक तेजी से अपनी पकड़ खोता जा रहा है। इसका नेतृत्व ऐसे हाथों में है जो अब बूढ़ा हो गया है जबकि इसके उलट उनकी प्रबल विरोधी जयललिता अपेक्षाकृत कम उम्र की हैं और उन्हें शर्मिदा करने का कोई मौका नहीं चूकतीं। करुणानिधि चौरासी वर्ष के हैं और भले ही उनके पुत्र स्टालिन उनके अघोषित उत्तराधिकारी हों, लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि करुणानिधि के परिदृश्य से गायब होते ही उनके बड़े सुपुत्र अझागिरि और पराए कर दिए गए दयानिधि मारन फिर सिर उठाने लगेंगे।
मान लीजिए कि चुनाव करुणानिधि के नेतृत्व में ही लड़े जाते हैं तो भी जीत उनके हाथों से फिसलती नजर आ रही है। करुणानिधि ने जहां देश के लाखों लोगों के आराध्य भगवान राम के बारे में कटु टिप्पणियां कीं, वहीं सेतुसमुद्रम परियोजना में तेजी लाने हेतु केंद्र सरकार पर दबाव डालने की खातिर बंद की घोषणा पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बावजूद अगले दिन सांकेतिक रूप से बंद और भूख हड़ताल के बावजूद वे स्थानीय जनता को लुभाने में नाकामयाब रहे। उन्हें यह कहते हुए अपने कदम वापस खींचने पर मजबूर होना पड़ा कि उनका इरादा हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने का नहीं था और वे ‘सांकेतिक बंद’ के पीछे नहीं थे।
करुणानिधि द्वारा पहले दयानिधि मारन पर अपार स्नेह बरसाने और बाद में उन्हें पूरी तरह हाशिए पर धकेलने से भी कार्यकर्ता भ्रमित हो गए। मारन को न सिर्फ केंद्रीय कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया गया वरन उनके उत्तराधिकारी राजा(जो खुद डीएमके से हैं) ने उन पर दूरसंचार मंत्रालय में अनियमितता बरतने के आरोप तक लगाए।
मौजूदा हालात के लिहाज से करुणानिधि भी यह समझते हैं कि जल्द चुनाव होने से जयललिता को फायदा हो सकता है और ऐसी शक्तियां उभर सकती हैं जिससे राज्य में उनकी सरकार को खतरा हो सकता है।
इसके बाद शरद पवार और उनकी एनसीपी भी है। पवार ने कांग्रेस के समक्ष यह साफ कर दिया है कि वे जल्दी चुनाव नहीं चाहते क्योंकि वे इसके परिणामों को लेकर आशंकित हैं। मौजूदा सरकार का टिका रहना वाम दलों के रुख पर निर्भर है लेकिन यदि जल्दी चुनाव होते हैं तो उन्हें भी मौजूदा संसद में कुछ सीटें खोनी पड़ सकती हैं।
खुद कांग्रेस के लिए भी सब कुछ ठीक नहीं है। महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा में हवा का रुख विपक्ष की ओर हो सकता है। पंजाब में विधानसभा चुनावों की तरह इस बार भी अकाली-भाजपा गठजोड़ हावी हो सकता है। आंध्रप्रदेश में कांग्रेस की कुछ सीटें तेलुगुदेशम के पक्ष में जा सकती हैं। कांग्रेस यह सोचकर खुद को दिलासा दे सकती है कि एनडीए की ताकत भी नहीं बढ़ रही है।
उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में बहुजन समाज पार्टी और समाजवार्दी पार्टी ही प्रमुख खिलाड़ी हो सकते हैं, हालांकि मौजूदा हालात के हिसाब से बसपा थोड़े फायदे में रह सकती है। लेकिन मायावती की दोस्ती पर कांग्रेस उसी तरह भरोसा नहीं कर सकती जैसे जयललिता पर भाजपा नहीं कर सकती।
आखिरकार, अगले लोकसभा चुनाव कब हो सकते हैं, इसके बारे में फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता। जैसी परिस्थितियां अभी हैं, उस लिहाज से कांग्रेस थोड़े फायदे में हो सकती है लेकिन वह भी यह देखते हुए कि कभी भी नए समीकरण उभर सकते हैं और चुनाव खत्म होने से पहले भी मतदाताओं की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं, मध्यावधि चुनाव का दांव नहीं खेलना चाहेगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।