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गेहूं का वाजिब समर्थन मूल्य

सम्पादकीय. केंद्र सरकार ने आगामी रबी फसल के लिए गेहूं के समर्थन मूल्य में एकमुश्त डेढ़ सौ रुपए की बढ़ोतरी करने की कृषि लागत व मूल्य आयोग की सिफारिश को जस का तस स्वीकार करके सही समय पर सही फैसला किया है।

गेहूं की बोवनी शुरू होने के पहले बढ़े हुए समर्थन मूल्य की घोषणा से किसानों को भी यह आश्वस्ति मिलेगी कि सरकार वाजिब कीमतों की उनकी मांग के प्रति संजीदा है और उनके लिए गेहूं पैदा करना घाटे का सौदा नहीं है।

अन्यथा उन्हें यह शिकायत करने का मौका मिलता कि विदेशों से गेहूं आयात के लिए समर्थन मूल्य से ड्योढ़ी से भी ज्यादा कीमत देने वाली सरकार उनकी वाजिब मांग की उपेक्षा कर रही है। अगर सरकार ने पिछले ही साल समर्थन मूल्य 900-950 रुपए प्रति क्विंटल करने का फैसला कर लिया होता, तो बहुत संभव था कि गेहूं के आयात की जरूरत ही नहीं पड़ती।

हाल के वर्षो में दुनियाभर में गेहूं की कीमतें बेतहाशा बढ़ी हैं और रकबा बढ़ने के बावजूदउसके उत्पादन में ठहराव आया है। उत्पादन अलाभकारी होने के कारण भी किसान दूसरी फसलों में रुचि लेने लगे हैं।

नतीजतन पिछले दो साल से सरकारी एजेंसियां समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी के लक्ष्य को हासिल करने में बुरी तरह नाकाम रहीं और सरकार को मजबूर होकर ऊंची कीमतों पर 13 लाख टन गेहूं आयात के सौदे करने पड़े। सरकार ने तो पांच लाख टन और गेहूं आयात करने की भी तैयारी कर ली थी, पर विदेशों से मिले टेंडरों में ऊंचे भाव कोट किए जाने और देश के भीतर ऊंची कीमत देने का विरोध मुखर होने से उसे ठिठकना पड़ा।

ऐसा नहीं है कि पिछली रबी फसल में देश में गेहूं के उत्पादन में कोई बड़ी गिरावट आई हो, लेकिन बंदिशें हटने के कारण इसके व्यापार में निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के उतर पड़ने और उनके द्वारा समर्थन मूल्य से थोड़ी-सी ज्यादा कीमत की पेशकश करने से किसानों के एक वर्ग ने सरकारी एजेंसियों की बजाय उन्हें गेहूं बेचने को तरजीह दी। इसके अलावा कुछ संपन्न किसानों ने ज्यादा कीमत मिलने की उम्मीद में फसल को अपने ही पास रोक लिया।

इन परिस्थितियों में सरकार के पास बेहतर समर्थन मूल्य नहीं देने के लिए कोई ठोस बहाना था भी नहीं। समर्थन मूल्य बढ़ने के कारण खुले बाजार में आम शहरी उपभोक्ता को गेहूं की कुछ ज्यादा कीमतें देनी पड़ सकती हैं। उसे ऐसा करना अखरेगा भी, पर वैश्विक बाजार नीतियों के दौर में उसके पास मन मसोसकर रह जाने के अलावा कोई विकल्प है भी नहीं।





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