जोधपुर. कल तक उनकी जिंदगी में अंधेरा छाया हुआ था, मगर अब उनकी आंखों को रोशनी मिल गई है। वे काली अंधेरी दुनिया से निकल आए हैं और ठीक उसी
तरह दुनिया देख रहे हैं जैसे हम और आप देखते हैं।
यह कारनामा नेत्रहीन विकास संस्थान की दो छात्राओं के साथ उपचार के बाद हुआ है। बचपन से ही इन्हें दिखना बंद हो गया था। एक वर्ष पूर्व जब एएसजी आई अस्पताल के डा. अरूण सिंघवी और शशांक गांग ने संस्थान में कैंप आयोजित किया और इन बच्चों की आंखें चैक की तो पाया कि ये नेत्रहीन बच्चे एक दिन दुनिया के रंग देख सकते हैं। डा. सिंघवी और गांग ने साढ़े तीन सौ बच्चों के आंखों की जांच करने के बाद डेढ़ सौ बच्चों का चयन कर उपचार शुरू किया। अब तक वे यहां के 59 बच्चों कीआंखों का उपचार कर चुके हैं। इनमें से दो बच्चे आम लोगों की तरह देख सकते हैं और अपने सभी काम खुद करते हैं जबकि छह अन्य बच्चों को थोड़ा बहुत दिखने लगा है।
इन्हें भी हुआ फायदा
डा. सिंघवी और गांग ने अब तक संस्थान के साठ बच्चों के आपरेशन किए हैं। इन में से लाखनसिंह (14), मालाराम (13), मंजू (9), चेतना (13), निर्मला (12) और चंद्रकला (11) भी उपचार के बाद आसपास की चीजें और अंधेरा-उजाला तक को पहचान सकते हैं।
उपचार का बीड़ा उठाया
डा. सिंघवी और डॉ. गांग ने बताया कि नेत्रहीन विकास संस्थान की संस्थापक अध्यक्ष श्रीमती सुशीला बोहरा के कहने पर फरवरी में बच्चों के आंखों की जांच की तो पाया कि इनमें से तीस बच्चों की आंखों को रोशनी दी जा सकती है। दोनों युवा डाक्टरों ने बच्चों को रोशनी दिलाने का जिम्मा उठाया। अब तक 59 बच्चों की आंखों का उपचार किया जा चुका है। इन में से आठ बच्चों को रोशनी मिली है।
जिंदगी में आया उजाला
ग्यारह वर्षीया सुमित्रा के लिए 23 मार्च 2007 का दिन एक सपने से कम नहीं था, जब ऑपरेशन थियेटर में ही उसे अचानक उजाला नजर आने लगा। कुछ दिनों बाद ही वह आम लोगों की तरह देखने लगीं। अब उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं बल्कि वह दूसरों के लिए सहारा बन रही है। इस नई जिंदगी से वह बेहद खुश है। वह चाहती है कि उसकी अन्य सहेलियां भी उसकी तरह आंखों की रोशनी पा लें। अब वह सामान्य स्कूल में दाखिला लेकर आगे की पढ़ाई करना चाहती है। मगर समस्या यह है कि ब्रेल लिपि के अलावा वह अन्य लिपि पढ़ लिख नहीं सकती है।
ऐसा ही कुछ चौदह वर्षीया हर्षा के साथ तीन अप्रैल 2007 को हुआ, जब डा. सिंघवी और गांग ने उसके आंखों का आपरेशन किया। ऑपरेशन के कुछ समय बाद ही उसे धीरे धीरे दिखाई देने लगा। अब वह भी सुमित्रा की तरह सामान्य स्कूल में दाखिला लेकर आगे की पढ़ाई करना चाहती है। महज छह माह में ही वह सभी रंगों को पहचानने लगी हैं।