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किशोर दा : कुछ खट्टी-मीठी यादें

Kishore night

यारी है ईमान मेरा...
सेठी नगर निवासी शीला सोनवाने बताती है 1972 में इंदौर में किशोरकुमार नाइट का आयोजन किया गया। खंडवा से किशोर ने दोस्तों को कार्यक्रम में बुलाया था। मैं और मेरे पति भी इंदौर पहुंचे। किशोर ने सभी दोस्तों को मंच पर बुलाया। सभी को मंच जाने से रोका गया तो किशोर ने कहा कार्यक्रम नहीं होगा। कलेक्टर ने खंडवा से आए सभी दोस्तों को मंच पर बुलाया और कार्यक्रम शुरू हुआ। हम 20 दिन बाम्बे में किशोर दा के घर रुके। उन्होंने मधुबाला से मुलाकात करवाई। शूटिंग का काम छोड़कर हमें घुमाना, मस्ती करना और जो भी मिले उसे खंडवा वाले मेहमानों के नाम से मिलवाया जाता था।

‘किसिंग किशोर’ की कहानी
किशोर से मिलने बंबई गए खरगोन के रमेशचंद्र गौर उस दिन को कभी नहीं भूल सकते जब किशोर के ड्राइवर ने उनके व किशोर के प्रगाढ़ संबंधों की चर्चा पत्नी योगिता बाली से अलग ही अंदाज में की थी। किशोर श्री गौर व फिलहाल भोपाल में रहने वाले मदन मोहन महोदय को बेहद चाहते थे। लंबे अरसे के बाद बंबई में मिलने पर किशोर ने श्री गौर को इतना चूमा था कि उनका ड्राइवर यह देख हतप्रभ रह गया। उसने बातों ही बातों में योगिता बाली से कह दिया- मैडम! साहब ने इन्हें इतनी पप्पियां दी हैं कि आज तक आपको भी नहीं मिली होंगी..! इस संवाददाता को यह किस्सा सुनाते-सुनाते श्री गौर के चेहरे पर दोस्ती की चमक उभर आई।

पर्दे के पीछे से गाया था पहला गीत
बुरहानपुर के रामअवतार चौरसिया ने बताया दादामुनि का भाई होने से किशोर को कॉलेज के कार्यक्रम में गीत गाने के लिए कहा। उन्होंने पर्दे के पीछे गाने की शर्त रखी थी। आधा गाना होने पर ही पर्दा उठा लिया। वह घबरागए उन्हें सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे-तैसे उन्होंने अपना पहला गाना पूरा किया।

मन्नाडे बेहतर गा सकते हैं
फिल्म आनंद का गीत जिंदगी कैसी ये पहेली हाय.. कभी तो हंसाए कभी ये रुलाए के साथ एक वाकया जुड़ा हुआ है। फिल्म के डायरेक्टर इसे लेकर किशोर के पास पहुंचे। उन्होंने गीत पढ़ा। तकरीबन एक घंटे की खामोशी के बाद किशोर ने कहा यह गीत आप मन्ना डे के पास ले जाइए, वे इसे मुझसे कई गुना बेहतर तरीके से गाएंगे। डायरेक्टर को अजीब लगा लेकिन उन्होंने वैसा ही किया और फिल्म बनाने के बाद आज तक यह गीत दिलों में बसा है। यह वे किशोर थे जिनके लिए पैसा मायने नहीं रखता था। वे तो फन के कद्रदान थे।

‘परफेक्ट सिनेमा थे किशोर कुमार’
आभास अपने आप में परफेक्ट सिनेमा थे। उन्होंने गायन, संगीत, एक्टिंग और डायरेक्शन किसी से नहीं सीखा। बचपन से ही उन्हें इन चीजों का शौक था। घर में ही दोस्तों के साथ ड्रामा करते थे। यह सब पिताजी को बिना बताए करते थे। जब वह पहुंचते तो सारे दोस्त भाग जाते। यह बात किशोर कुमार के बचपन के दोस्त रामअवतार चौरसिया ने कही। उन्होंने बताया किशोर को मारधाड़ वाली फिल्में पसंद थीं। अशोक कुमार की विलेन के रोल वाली ‘जीवन नैया’ फिल्म देखने के लिए कतार में खड़े होकर टिकट खरीदा। किशोर के दोस्तों को यह फिल्म पसंद नहीं आई। उन्होंने तुरंत दादामुनि को चिट्ठी लिखकर ऐसी फिल्में नहीं करने के लिए कहा।

कोट-पैजामा पहनकर खेला था फुटबॉल
किशोर को फुटबॉल खेलना पसंद था लेकिन कोट और पैजामा नहीं उतारने के कारण उन्हें एक बार टीम में नहीं लिया गया। अचानक एक खिलाड़ी के बीमार पड़ने पर उन्हें टीम में लेना पड़ा। कप्तान को पैजामे पर खेल रहे किशोर पर जरा भी भरोसा नहीं था। स्वभाव से चुलबुले किशोर ने टीम की ओर से पहला गोल दागा तो सभी आश्चर्यचकित हो गए।



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