अभिमत. यह जिज्ञासा कइयों के मन में होगी कि यदि अंतत: ऑस्कर के लिए विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘एकलव्य’ को ही आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर स्वीकारना था, तो फिर इतना हो-हल्ला क्यों मचाया गया? इंडस्ट्री के नामी-गिरामी लोगों ने ‘एकलव्य’ को मुद्दा बनाकर एक-दूसरे पर इतनी कीचड़ क्यों उछाली?
यह जानते हुए भी कि हर वर्ष ऑस्कर के लिए भेजी जाने वाली भारतीय प्रविष्टि सर्वमान्य नहीं होती है, इस चलन से यह वर्ष भी अछूता नहीं रहा। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘एकलव्य’ के मुकाबले भावना तलवार की फिल्म ‘धर्म’, शिमित अमीन की फिल्म ‘चक दे इंडिया’ और अनुराग कश्यप की फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ भी होड़ में थीं, लेकिन फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ने ‘एकलव्य’ को चुना और शुरू हो गया एक-दूसरे को नीचा दिखाने का ‘विश्वयुद्ध।’
भावना तलवार पक्षपात का आरोप लगाकर अदालत चली गईं, तो विधु विनोद ने पूरी इंडस्ट्री को ‘मंदिर’ और ‘वेश्यालय’ के खेमों में बांट दिया। वैसे इस सारे फसाद की जड़ फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया रहा, जो वर्ष दर वर्ष उठने वाले विवादों के बावजूद चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्टता लाने के कोई प्रयास नहीं कर रहा।
इस वर्ष भी ‘चक दे इंडिया’ का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन व दर्शकों की सराहना इसे दावेदारी का प्रबल हकदार बनाती थी, लेकिन अब देश का नाम न खराब हो इस आधार पर ‘एकलव्य’ को ही आधिकारिक प्रविष्टि करार दे दिया गया। इस क्रम में यह कहना भी उचित ही रहेगा कि ‘एकलव्य’ सिरे से दोयम दर्जे की फिल्म की श्रेणी में नहीं रखी जा सकती।
लॉस एंजिल्स टाइम्स ने ‘एकलव्य’ को डेविड लीन की फिल्मों की श्रेणी में रखा है तो द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इसे ‘क्लासिक’ करार दिया। भारत में भी फिल्म को मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। ऐसे में हमें अब सारे विवाद को दफनाते हुए भारतीय ‘धर्म’ निभा ‘एकलव्य’ के लिए यही कहना चाहिए, ‘चक दे इंडिया।’