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क्रिकेट संस्कृति पर नस्लवादी फिकरों का संक्रमण

आलेख. आस्ट्रेलिया को हार पसंद नहीं और जब कभी मैदान में उसकी हार हो भी जाती है, तो पहला अवसर प्राप्त होते ही वह हिसाब चुकता करने की फिराक में रहता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ, लेकिन खेल के मैदान के बाहर जो घटा वह भारतीय खेल प्रेमियों के लिए शर्म की बात थी। सीरीज के समाप्त होने तक क्रिकेट से अधिक भारतीय दर्शकों का नस्लवाद बहस का विषय बन गया।

बहरहाल, नस्लवाद और उससे जुड़ा मानवाधिकारों का मुद्दा भले ही आस्ट्रेलियाई खेलों का हिस्सा न रहा हो, फिर भी वहां का जीवन इस दोष से मुक्त नहीं रहा। इसी का विरोध प्रकट करने के लिए एंड्रयू साइमंड्स की तरह वहां के मूल निवासियों की सफलता की प्रतीक कैथी फ्रीमैन ने 1998 कामनवैल्थ खेलों में 400 मीटर की दौड़ के बाद काला ध्वज लपेटकर स्टेडियम के ट्रैक की परिक्रमा की थी।

आस्ट्रेलियाई समाज को इस बात का भी श्रेय दिया जाना चाहिए कि कैथी फ्रीमैन की आलोचना करने के बावजूद उन्होंने कैथी को ही सिडनी 2000 में ओलिंपिक मशाल जलाने का गौरव प्रदान किया था। इसके बावजूद नस्लवाद के घिनौने चेहरे ने अपने आप को कुछ वर्ष पूर्व आस्ट्रेलिया के क्रिकेट मैदानों में दिखाया जब दक्षिण अफ्रीका के मखाया नतिनी को दर्शकों द्वारा निकाली गई बंदरों की आवाज का सामना करना पड़ा।

इंग्लैंड के पिछले एशेज दौरे के दौरान उसके भारतीय मूल के खिलाड़ियों को नस्लवादी तानों का शिकार होना पड़ा। पर क्या किसी ने कल्पना की थी कि भारत में भी नस्लवाद के इस चेहरे को खेल के मैदानों पर देखा जाएगा? गुलामी, रंगभेद और नस्लवाद का शिकार रह चुका भारत शायद अपने आर्य होने के बोझ से ही इस बुराई का शिकार हो रहा है। जिस समाज में फेयर एंड लवली और फेयर एंड हैंडसम जैसे विज्ञापन और प्रोडक्ट धड़ल्ले से चलते हों, उसे नस्लवादी भावनाओं का पोषक होने में देर नहीं लगती।

जहां तक भारतीय खिलाड़ियों का प्रश्न है तो वर्तमान सीरीज की तैयारी और प्रदर्शन ही बताते हैं कि दोष उनका उतना नहीं है जितना क्रिकेट बोर्ड का है जिसने उन्हें ट्वेंटी-20 चैंपियन होने का आनंद भी अभी पूरी तरह से उठाने नहीं दिया और घायल शेर से भिड़ने का आयोजन कर डाला। ट्वेंटी-20 टीम में अनेक युवा खिलाड़ी थे। स्वाभाविक है कि जब यह सीरीज प्रारंभ हुई तो जीत का खुमार अभी भी उनके सिर चढ़ा हुआ था।

शायद यही कारण है कि जहां श्रीसंथ और हरभजन सिंह यह भूल गए कि 50 ओवरों के मैच में उनसे चार बेहतरीन ओवर की जगह दस बेहतरीन ओवर डालने की अपेक्षा की जाती है, तो वहीं उथप्पा जैसे खिलाड़ियों को यह समझने में वक्त लगा कि 18 गेदों में 36 रन ट्वेंटी-20 में तो मैच जितवा सकते हैं, पर एक दिवसीय मुकाबलों में इस तरह की तेज पर छोटी पारी से हार की आशंका अधिक बढ़ जाती है।

सीरीज से पहले दोनों टीमों के मुंह में कसैला स्वाद छोड़ने वाला वाकयुद्ध भी प्रारंभ हो चुका था। ऐसी स्थिति में मीडिया के सामने ठोकी गई ताल के अनुरूप मैदान में प्रदर्शन भी करना होता है।

श्रीसंथ एक युवा और अपरिपक्व खिलाड़ी हैं, इसीलिए दक्षिण अफ्रीका में आंद्रे नेल की गेंद पर छक्का मारने के बाद जब उन्होंने बल्ला घुमाते हुए नृत्य किया था तो मैच रैफरी की आलोचना के बावजूद लोगों ने उन्हें इसलिए सराहा था कि आंद्रे नेल के आक्रामक हावभाव भी अक्सर खेल भावना की सीमा को पार करते रहे हैं। दुर्भाग्य है कि नेल के दोषों को श्रीसंथ इतना अपना चुके हैं कि मोहल्ले में खेली जा रही क्रिकेट और देश का प्रतिनिधित्व करते हुए खेली जा रही क्रिकेट के बीच के अंतर को भी वह भुला बैठे हैं।

वास्तव में इस सीरीज को जितनी जल्दी भुला दिया जाए अच्छा है क्योंकि आगे अनेक कठिन चुनौतियां हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि टीम को एक प्रोफेशनल कोच की आवश्यकता है। टीम को एक मनोवैज्ञानिक की भी आवश्यकता है जो श्रीसंथ और हरभजन जैसे खिलाड़ियों को आत्मविश्वास से जन्मे आक्रामक खेल और हीन भावना से प्रेरित आक्रामक तेवरों के बीच का अंतर समझा सके।

आक्रामक खेल और भावना के बिना न तो सचिन तेंदुलकर हजारों रन बना सकते थे और न ही अनिल कुंबले विकेटों का अंबार लगा सकते थे। यह बात युवा खिलाड़ी जितनी जल्दी समझ जाएं उतना ही बेहतर होगा। इसके अतिरिक्त इन खिलाड़ियों को यह भी समझना होगा कि जैसे टेस्ट मैच 50 ओवरों के एक दिवसीय से भिन्न तकनीक और मानसिकता की मांग रखते हैं, वैसे ही एक दिवसीय मैच ट्वेंटी-20 से अलग शैली, तकनीक, मानसिकता और फिटनेस की मांग रखते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में पसीने के कारण आज तक कोई भी बल्लेबाज 50 ओवर तक बल्लेबाजी नहीं कर पाया है, लेकिन टीम वही जीतती है जिसके अधिकांश खिलाड़ी एक लय में 35 से लेकर 45 ओवर तक खेलने का माद्दा रखते हों। इसका रहस्य यदि प्रतिद्वंद्वी एंड्रयू साइमंड्स से जानने की आवश्यकता हो तो उनसे भी परामर्श कर लेना चाहिए।

-लेखक खेल मामलों के टिप्पणीकार हैं।





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