दृष्टिकोण. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस में दो व्यवसायियों की पुलिस द्वारा एक फर्जी मुठभेड़ में की गई हत्या के सिलसिले में दिल्ली सत्र न्यायालय का फैसला स्वागत योग्य तो है ही, लेकिन साथ ही साथ पुलिस बलों के कानून से परे कृत्यों पर गहरी चिंता को उभारने वाला भी है। यह भी कम अफसोसनाक नहीं कि राजधानी में हुए इस जघन्य कृत्य का फैसला आने में दस साल का समय लगा।
ऐसा तब हुआ जब मारे गए व्यवसायी उच्च वर्ग से ताल्लुक रखते थे। आरोपी पुलिस वाले इतने वर्षो तक जमानत पर रहे, जबकि सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि गंभीर सामाजिक अपराध से जुड़े अपराधियों को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। यह कोई कभी नहीं जान पाएगा कि दिल्ली पुलिस की इस स्पेशल एनकाउंटर यूनिट ने और कितने लोगों के साथ क्या-क्या किया होगा।
कनॉट प्लेस का यह चर्चित मामला, दस साल में ही सही, अदालती फैसले के मुकाम तक इसलिए पहुंच पाया, क्योंकि इसके शिकार हुए लोग सक्षम परिवारों के थे और इनकी पत्नियां पूरे धैर्य के साथ इंसाफ के लिए डटी रहीं। दुर्भाग्य से यदि इस फर्जी मुठभेड़ के शिकार होने वाले लोग गरीब होते तो निश्चत ही पुलिस के खिलाफ कोई मामला तक दर्ज नहीं होता।
यही नहीं, उलटे पुलिस ही मृतकों के परिजनों के खिलाफ आतंकवादी होने का प्रकरण दर्ज करती, उन्हें प्रताड़ित करके जो चाहती वह कबूल करवाती और अपने गवाह जुटाकर उन्हें सजा दिलवाती। ऐसा लगता है कि हमारे देश में पुलिस वालों को हत्या करने का लाइसेंस मिला हुआ है। जहां देखो तहां पुलिस के हर दर्जे के कर्मचारी इसका जब चाहे तब निर्दयतापूर्वक उपयोग करते रहते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि हम ऐसे प्रजातांत्रिक देश के नागरिक हैं जहां कानून का राज है ही नहीं।
इस मुठभेड़ में हुई हत्याओं के फैसले पर जस्टिस जीवन रेड्डी ने अपना अभिमत दिया कि जब भी किसी पुलिस वाले के हाथों कोई व्यक्ति मारा जाए, तो उस पर एफआईआर निश्चित ही दर्ज की जानी चाहिए और उसका आपराधिक अभियोजन किया जाना चाहिए। फिर आरोपी पर यह निर्भर करेगा कि वह तर्कसंगत तरीके से अपना बचाव करे और अंत में न्यायालय सुबूतों के आधार पर यह फैसला दे कि मामला हत्या का बनता है कि नहीं।
दुर्भाग्य से भारत में ऐसा कभी नहीं होता। उलटे जो व्यक्ति मारा जाता है, पुलिस उसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करती है और चूंकि वह मर चुका होता है इसलिए बाद में प्रकरण में खात्मा लगा दिया जाता है। यह पुलिस का एक ऐसा धूर्ततापूर्ण तरीका है जिसके जरिए मुठभेड़ में हुई मौतों को न्यायालय की पड़ताल व उसकी निगाहों से दूर रखा जाता है।
हमारी न्यायपालिका भी इस मामले में शिथिल है। वह इसलिए कि सिद्धांतत: ऐसी मुठभेड़ों में प्राय: गरीब लोग ही मारे जाते हैं, उनके बारे में यह धारणा होती है कि पुलिस जो कह रही है उसके अनुसार ये निश्चित ही अपराधी और असामाजिक तत्व ही हैं और इसलिए ये सजा के ही लायक हैं।अदालतों की इस तरह की सोच के चलते पुलिस भी यह मानने लगती है कि वह अपने आप में खुद कानून है।
हाल ही के मामले में दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त मेक्सवेल परेरा ने एक टीवी इंटरव्यू में कनॉट प्लेस की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उनका कहना था कि यह मामला अपराधियों की गलत शिनाख्त का है। यानी कि पुलिस को जिनकी सूचना मिली वह सही नहीं निकली। खैर, मान लीजिए यह मामला गलत शिनाख्त का ही है, तो ऐसे दो लोगों को क्यों मौत के घाट उतार दिया गया, जिनके पास कोई हथियार भी नहीं थे? निहत्थे लोगों से पुलिस को भला क्या खतरा हो सकता था?
घटना से जुड़े साक्ष्य बताते हैं कि पंद्रह पुलिस वालों ने अचानक एक वाहन को घेर लिया जबकि वाहन में बैठे लोगों की ओर से कोई प्रतिरोध नहीं किया गया था। पुलिस ने अपनी योजना के मुताबिक कार्रवाई को अंजाम दिया और वाहन के भीतर एक हथियार इसलिए फेंक दिया ताकि यह दर्शाया जा सके कि वे लोग सशस्त्र थे।
आज विभिन्न टीवी चैनलों में साधारण से प्रदर्शनों में भी पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर बर्बरतापूर्वक लाठी बरसाते हुए दिखाया जाता है। शिकार होने वाले विकलांग हैं या कि मजदूर संगठनों के कार्यकर्ता जो अपनी बात स्वतंत्रतापूर्वक कहने के संवैधानिक अधिकार का उपयोग कर रहे हैं, पुलिस को इस बात से कोई लेना-देना नहीं।
ब्रिटेन और अन्य लोकतांत्रिक देशों में पुलिस को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाता है कि वे ऐसे मौकों पर धैर्य व संयम से काम लें तथा कम से कम बल प्रयोग करें। यहां तक कि यदि भीड़ हिंसा पर उतारू हो, तो भी संयम से काम लें। यदि पुलिसकर्मियों को चोटें भी आ जाएं तो भी बदले में कोई सख्त कार्रवाई न करें। वहां यह सब पुलिस के प्रशिक्षण का एक अनिवार्य हिस्सा है।
पर अपने यहां तो पुलिस का व्यवहार अपराधियों के एक समूह की तरह होता है। पुलिस वालों के दिलो-दिमाग में जात-पात, संप्रदाय और लिंग-भेद की भावनाएं भरी रहती हैं। वे जरा सी बात पर निजी प्रतिष्ठा का मामला बनाकर बदले की कार्रवाई शुरू कर देते हैं। पुलिस में सुधार कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता। पुलिस के अधिकारी भी सुधार को पुलिस के नजरिए से ही देखते हैं।
उनका सिर्फ एकसूत्रीय एजेंडा है कि पुलिस को राजनीतिक दखल और उसके नियंत्रण से मुक्त करो। यदि पुलिस पर राजनीतिक नियंत्रण की जगह सक्षम नागरिक नियंत्रण बने तो यह अच्छी बात होगी, लेकिन पुलिस तो किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं चाहती।
और अब इसलिए पुलिस सुधार की दिशा इसे अपराध की सबसे बड़ी संगठित इकाई बनाने की ओर मुड़ गई है, जो पूरी तरह गैरजवाबदेह होगी। पुलिस के सुधार की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और पुलिस प्रताड़ना के बारे में विचार करने के लिए कोई शब्द ही नहीं है,जो कि देश की जनता की चिंता का प्रमुख मुद्दा है।
-लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।