सम्पादकीय. पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की वतन वापसी के मौके पर निकाले गए स्वागत जुलूस में पाकिस्तान के बंदरगाह नगर कराची में हुए भीषण आत्मघाती विस्फोट की जितनी भी निंदा-भत्र्सना की जाए, कम है। गनीमत रही कि जिस बख्तरबंद गाड़ी में बेनजीर सवार थीं उससे महज 10-15 फुट की दूरी पर हुए विस्फोट में वे साफ बच गईं।
विस्फोट में बेनजीर को कुछ हो जाने की स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया की कल्पना करने भर से सिहरन होती है। ऐसे में पाकिस्तान में लोकतंत्र, आधे-अधूरे ही सही, की बहाली की प्रक्रिया तो पटरी से उतर ही जाती, हिंसा-प्रतिहिंसा और आरोप-प्रत्यारोप का दौर पाकिस्तान के हालात बद से बदतर बना देता। स्वाभविक रूप से इस विस्फोट के लिए शक की सुई सबसे पहले अल-कायदा और तालिबान जैसे संगठनों की ओर घूमती है।
मगर बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी ने विस्फोट के लिए पाकिस्तान की एक खुफिया एजेंसी को जिम्मेदार ठहराकर जांच में इस पहलू पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत बताई है। बेनजीर खुद भी पहले एकाधिक बार पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पुराने लोगों से अपनी जान को खतरा होने की बात कह चुकी हैं।
हकीकत है कि जनरल मुशर्रफ के आठ साल के कार्यकाल में पाकिस्तान में आतंकवाद की जड़े लगातार गहरी होती गई हैं। इन जड़ों को उखाड़ पाना न तो मुशर्रफ के बूते में हैं और न ही उनकी सरपरस्ती में चलने वाले सुरक्षा तंत्र में। वे खुद अपनी सुरक्षा कर लें, इतना ही बहुत है।
अमेरिका के दबाव में मुशर्रफ ने बेनजीर के साथ सत्ता में भागीदारी का गोलमोल समझौता भले ही कर लिया हो पर गुरुवार के विस्फोट का साफ संदेश है कि इस समझौते के विरोधी तत्व चैन से नहीं बैठने वाले हैं। उन्हें न तो मुशर्रफ कबूल हैं, न बेनजीर। एक बार आतंकवाद के रास्ते पर भटक गए लोगों को मुख्यधारा में वापस लाना बेहद मुश्किल काम है।
पाकिस्तान में यह काम और भी कठिन है, क्योंकि वहां का सत्ता तंत्र और सामाजिक ताना-बाना आतंकवाद को फलने-फूलने के भरपूर मौके देता आया है। भारत और अफगानिस्तान दोनों ही पाक-प्रायोजित आतंकवाद की पीड़ा के भुक्तभोगी हैं। पाकिस्तान में जो कांटे दूसरों के लिए बोए जाते रहे हैं, अब वे उसे खुद चुभने लगे हैं। इनसे निजात पाने के उपाय भी उसे खुद ही तलाशने होंगे।
इसके लिए सबसे पहले मुशर्रफ को देश में वास्तविक लोकतंत्र की बहाली करनी होगी। यह तभी संभव होगा जबकि वे बेनजीर की तरह नवाज शरीफ को भी सम्मानपूर्वक वतन लौटने दें। शरीफ के बगैर पाकिस्तान में लंगड़ा लोकतंत्र ही खड़ा हो सकता है जो किसी भी सूरत में आतंकवाद के खिलाफ कारगर लड़ाई नहीं लड़ सकता।