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Chhattisgarh
Raipur Raipur भिलाई. उद्योगों और भारी यातायात वाले हाइवे से सटे स्कूल बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। रविशंकर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और पर्यावरणविद् डा. शम्स परवेज ने स्कूलों में प्रदूषण के असर पर विस्तार के परीक्षण किया। यह शोध कार्य अमेरिकन जर्नल इन्वायरमेंटल मानिटरिंग एंड एसेसमेंट के लिए स्वीकृत किया गया है।
शोध के अनुसार ऐसे इलाकों में वायु प्रदूषण और धूल के महीन कणों की मात्रा इतनी अधिक होती है कि विद्यार्थी और शिक्षकों को फेफड़ों की अनेक बीमारी की आशंका काफी बढ़ जाती है।
तीन क्षेत्रों से लिया गया सैंपल :
डा. शम्स परवेज ने अपने शोध कार्य ‘सोर्स एप्रोशनमेंट आफ पर्सनल एक्सपोजर आफ फाइन पार्टिक्यूलेट अमंग स्कूल कम्यूनिटी इन इंडिया’ में शहर के तीन स्कूलों में धूल प्रदूषण के कारण लोगों के श्वसन स्तर पर होने वाले प्रभाव का अध्ययन किया। डा. परवेज के मुताबिक पटरीपार, नेशनल हाइवे और टाउनशिप के स्कूल से शिक्षकों व विद्यार्थियों के सैंपल लिए गए। मानिटरिंग इक्यूपमेंट से श्वसन स्तर की मात्रा का अवलोकन किया गया।
अनफिट है पटरीपार क्षेत्र :
पटरीपार क्षेत्र के उद्योगों से सटे स्कूल विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए सर्वाधिक घातक हैं। यहां के विद्यालयों से लिए गए सैंपल के गणितिक विश्लेषण के नतीजे होश उड़ा देने वाले थे। उद्योगों के धुएं से यहां का वातावरण इतना जहरीला हो चुका है कि बच्चे फेफड़ों की बीमारी से ग्रस्त हो रहे हैं। छाती में दर्द या फिर सर्दी खांसी तो बेहद आम हैं। प्रदूषण में 50 फीसदी योगदान उद्योगों की गैस और धुंए का है। रही-सही कसर मिट्टी में घुले केमिकल पूरी करते हैं।
स्कूल में उपयुक्त वेंटिलेशन की व्यवस्था नहीं होने के कारण भी स्कूल के वातावरण प्रदूषित करते हैं। इन विद्यालयों में प्रदूषण का आलम यह है कि पर्सनल एक्सपोजर की मात्रा 100 माइक्रो ग्राम की बजाय औसतन 700 माइक्रोग्राम तक पाई गई।
हाइवे पर बने स्कूल भी घातक
डा. परवेज ने बताया कि केस-2 के रूप में दुर्ग के नेशनल हाइवे से लगे स्कूल में भी सैंपल लिए गए। वहां प्रदूषण उद्योगों का न होकर धूल के गुबार से था। स्कूल के भीतर चाक डस्ट और प्रयोगशाला से निकलने वाली वाष्प आदि भी वातावरण को प्रदूषित करती है।
डा. परवेज के मुताबिक इन विद्यालयों में गाड़ियों से निकलने वाले धुएं और धूल के कणों का कांम्बिनेशन स्वास्थ्य को सर्वाधिक हानि पहुंचाता है। पर्सनल एक्सपोजर की मात्रा यहां भी अलार्मिग स्तर से तीन गुना अधिक है। मात्रा 300 से 400 माइक्रोग्राम तक पाई गई।
टाउनशिप माकूल बशर्ते हो हरियाली
टाउनशिप में सेंट्रल एवेन्यू से लगे स्कूल को भी अध्ययन के लिए चुना गया। हरियाली और उपयुक्त वेंटिलेशन के कारण मुख्य मार्ग पर होने के बावजूद प्रदूषण का स्तर इस स्कूल में कहीं कम पाया गया। डा. परेवज कहते हैं कि टाउनशिप प्रदूषण के लिहाज से सर्वाधिक सुरक्षित है। इसका सबसे प्रमुख कारण हवा की दिशा और टाउनशिप की बनावट है। क्षेत्र हरा-भरा है, इसलिए भी वायु प्रदूषण कम है।
टाइम बम सी स्थिति
शोध के मुताबिक प्रदूषण से सराबोर वातावरण में स्कूल की स्थिति भयावह है। प्रदूषण का प्रभाव कभी भी विकराल स्थिति ले सकता है। खासतौर पर पटरी पार, साउथ वेस्ट और नार्थ दिशा में स्थित स्कूल में प्रदूषण सामान्य स्तर से अधिक है। इन क्षेत्रों में विद्यालयों को शिफ्ट करना बेहद जरूरी है।
न दिखने वाला खतरा
रिसर्च निष्कर्ष हैं कि दुर्ग में धूल दिखाई देती है इसलिए उस क्षेत्र को प्रदूषित माना जाता है। जबकि उद्योगों से सटे क्षेत्रों में धूल के बेहद महीन कणों की मात्रा अधिक है। यह सेहत पर कहीं अधिक प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
फेफड़ों तक पहुंचते हैं
चेस्ट फिजीशियन डा. एके अग्रवाल ने बताया कि 10 माइक्रान से छोटे कण सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं और विभिन्न समस्याओं के कारक बनते हैं। यह महीन कण अक्सर औद्योगिक क्षेत्र में मिलते है क्योंकि इनकी उत्पत्ति का कारण ही बेहद अधिक तापमान में होने वाली क्रिया है। दुर्ग में जो धूल उड़ती है उसके कण आंखों को स्पष्ट रूप से दिखते हैं, क्योंकि इनका आकार बड़ा होता है। यह फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाते।
नाक की बनावट इनको रोकने के लिए उत्तम फिल्टर का काम करती है। सबसे आम एलर्जी, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा व सूजन होती है। बच्चे स्कूल में अपना काफी समय देते हैं। इसे देखते हुए स्कूल का स्वच्छ व प्रदूषण रहित जगह पर होना जरूरी है। बच्चे बड़ों की तुलना में प्रति मिनट अदि सांस लेते हैं। इसलिए उनकी श्वसन तंत्रिका काफी प्रभावित होती है।
सुझाव भी दिए गए
रिसर्च वर्क में कुछ सुझाव भी निष्कर्ष के रुप में दिए गए हैं। इसमें पटरी पार के कुछ क्षेत्र को स्कूल के लिए अनफिट करार दिया गया है। आर्किटेक्ट व पर्यावरणविद की कमेटी से वेंटीलेशन सिस्टम के अवलोकन की बात भी कही गई है। एक्जास्ट फैन व बेहतर क्वालिटी के चाक इस्तेमाल, पौधरोपण, हरे-भरे मैदान आदि के सुझाव भी दिए गए हैं।
ठंड में गंभीर होगी समस्या
ठंड में धुंआ व डस्ट पार्टिकल नीचे रह जाते है। हाउस होल्ड कुकिंग में इस्तेमाल होने वाले कंड़ों, कोयला, लकड़ी के कारण प्रदूषण की मात्रा बढ़ती है।
खतरा है यहां
भिलाई-3, खुर्सीपार, कैंप क्षेत्र के स्कूल।
सुपेला, हाउसिंग बोर्ड, वैशाली नगर के विद्यालय ।
रिसाली मरोदा, व दक्षिण पश्चिमी, उत्तर पूर्वी और उत्तर दिशा में स्थित विद्यालय। यहां संयंत्र का धुंआ हवा के साथ आता है।
नेशनल हाइवे और धूल की अधिकता वाले क्षेत्र में बने दुर्ग के स्कूल।