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Chhattisgarh
Raipur Raipur रायपुर. रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) ने जलविहार कालोनी स्थित गार्डन के सौंदर्यीकरण में बनारस के गधों को लगाया है। ये गधे मिट्टी को इधर से उधर ले जाने का काम इतनी कुशलता से कर रहे हैं कि वक्त भी बच रहा है और श्रम भी। हालांकि ये बनारस में भी यही काम करते हैं, लेकिन वहां गधे-घोड़े इतने ज्यादा हैं कि रोजगार के लिए उन्हें यहां आना पड़ा।
बनारस से दर्जनभर लोगों का दल यहां 40 गधों के साथ 15 घोड़े भी लाया है। इस दल के मोहम्मद सलीम और मोहम्मद गुलाम नबी ने बताया कि बनारस में गधों के लिए काफी कंपिटीशन हो गया है। काम ज्यादा नहीं है और संख्या भी बढ़ गई है। लिहाजा काम ढूंढ़ने के लिए कहीं तो निकलना पड़ेगा।
बनारस का बड़ा इलाका तंग गलियों वाला है। वहां ट्रक सड़कों पर बिल्डिंग मटेरियल गिराकर चले जाते हैं। इसे चार-पांच फीट चौड़ी गलियों में एक-एक किमी दूर ढोना पड़ता है। यह काम श्रमिक नहीं कर सकते। मटेरियल शिफ्ट करने के लिए गधे ही काम आते हैं। रायपुर में गलियां इतनी तंग नहीं हैं। फिर भी, उनके गधों का उपयोग तो हो रहा है।
टीम ने बताया कि सारे गधे अपने काम में निपुण हैं। पीठ पर लदे खाली थैले के साथ तब तक चुपचाप खड़े रहते हैं, जब तक कि इनमें मिट्टी या मटेरियल पूरा न भर जाए। उसके बाद ये निकल पड़ते हैं और सीधे वहीं रुकते हैं, जहां अनलोड करना है। वहां आसानी से मटेरियल उतार लिया जाता है। इस दल के मोहम्मद यूनुस ने बताया कि 10 गधे दिनभर में ट्रैक्टर ट्राली की 5 ट्रिप मिट्टी या मटेरियल शिफ्ट कर देते हैं।
फिर भी, गधों के मालिकों के लिए यह ज्यादा फायदे का सौदा नहीं है। वजह ये है कि दिनभर घास खाने के अलावा शाम को इन्हें कोढ़ा, गुड़, चोकर और चना देना पड़ता है। तब लाभ काफी कम हो जाता है। यहां उन्हें एक ट्राली मिट्टी की गार्डन में शिफ्टिंग का 475 रु. मिलता है। कई बार गधे पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते, इसलिए आमदनी भी घट जाती है।
मकान बनाने के लिए नहीं
गधे भले ही मटेरियल शिफ्टिंग सस्ते में करें, लेकिन कोई भी व्यक्ति अपना मकान बनाते समय इनकी सेवाएं नहीं लेता, क्योंकि दल के मुताबिक गृह निर्माण में गधों का उपयोग वर्जित माना गया है। बड़े बिल्डर में पुल वगैरह के निर्माण में इन्हें काम पर नहीं लगाते।