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वो राम की बारात और फूलों की बरसात..

बिलासपुर. एक समय था, जब दशहरे के पहले पूरे नौ दिन तक शहर राममय हो जाता। रामचंद्र के जन्म पर लोग खुशियां मनाते, सीता विवाह पर बारात निकलती, कन्यादान होता और लोगों में बारात के स्वागत और कन्यादान पर उपहार देने की होड़ लग जाती। यह सब होता था यहां नौ दिन तक चलने वाली रामलीला के दौरान। तब रावण के वध के लिए राम की वानर सेना शहर का चक्कर लगाने के बाद शनिचरी पड़ाव पहुंचती। उस दौरान दुर्गा स्थापना भी चुनिंदा जगहों पर होती थी।

शहर में पिछले कुछ समय से शारदीय नवरात्र पर जगह-जगह दुर्गा प्रतिमा स्थापित कर तामझाम के साथ पूजा-अर्चना की जाने लगी है। दशहरे पर रावण दहन भी लगभग हर मोहल्ले में कमेटियां बनाकर किया जाता है।1960-70 के दशक में इतनी सजावट और तामझाम न होते हुए भी श्रद्धा और उत्साह इससे कई गुना ज्यादा था।

शहर के पुराने लोग आज भी उन दिनों को याद करते हुए भाव-विभोर हो जाते हैं, जब बनारस के पास के गांव कजरीताल की रामलीला मंडली यहां आती थी। गोलबाजार में लक्ष्मी औषधालय के पीछे रामलीला का मंच सजता। पूरे नौ दिन तक रामायण के एक-एक अध्याय का मंचन इतने स्वाभाविक और खूबसूरत अंदाज में होता कि लोग उसमें डूब से जाते।

उस दौरान शहर इतना फैला नहीं था। गोलबाजार, मसानगंज, गोंड़पारा, पुराना सरकंडा, जूना बिलासपुर ही शहर के प्रमुख स्थलों में थे। रावण दहन भी प्रमुख तौर पर शनिचरी पड़ाव और स्टेशन इलाके में होता था।

शहर सहित आसपास के गांव से भी लोग यहीं इकट्ठे होते थे। रामलीला के दौरान भी पूरे क्षेत्र के लोग गोलबाजार में इसे देखने के लिए जुटते थे। सुधीरा खंडेलवाल और डा. कालीचरण यादव उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि शहर के प्रमुख लोगों में प्रतिदिन रामलीला मंडली के लोगों को भोजन कराने की होड़ मचती थी।

लोग उनके पात्रों को रामायण का जीवंत स्वरूप मानते। राम विवाह पर जब बारात निकलती, तो पूरे शहर का माहौल ऐसा होता, मानो उसी के घर से बारात निकल रही हो। व्यवसायी और लोग बारात के स्वागत के लिए आरती लिए खड़े रहते, फूलों की बरसात, फल, मिठाई और शरबत के साथ बारात की आवभगत होती थी।

सीताजी का कन्यादान का सौभाग्य पाने के लिए होड़ मची रहती। कई बार तो लोग पहले से पारी बांध लेते कि इस साल यह पुण्य कार्य वे करेंगे। रामलीला के दौरान जो भी चढ़ावा और उपहार मिलता, वह सब उनके पात्रों को ही भेंट कर दिया जाता था।

रहने की व्यवस्था भी घर में
रामलीला मंडली का सामान रखने और उनके रहने की व्यवस्था गोलबाजार के निवासी स्वर्गीय हरख खंडेल अपने घर पर ही करते थे। बारात और शोभायात्रा की व्यवस्था का जिम्मा गोंड़पारा निवासी स्व. तिग्गी चौधरी और स्व. गोवर्धनलाल गुप्ता पर था। इस दौरान गोलबाजार से प्रताप टाकीज चौक तक छोटी-छोटी झोपड़ियां बनाकर उनमें जीवंत झांकियां सजाई जाती थीं, जिसमें यज्ञ, ध्यान, पूजा-अर्चना करते ऋषि-मुनि आदि नजर आते।

रावण का पुतला दहन राम द्वारा ही
उस दौर में रावण के पुतले का दहन आज की तरह नेताओं से नहीं कराया जाता था, बल्कि रामलीला के राम ही पुतले पर बाण चलाकर आग लगाते थे। इसके लिए जब राम की सेना रवाना होती, तो शहर के बच्चे-बड़े इसमें वानर-भालू बनकर शामिल होते थे।

इसके अलावा दर्शकों और श्रद्धालुओं की भीड़ तो होती ही थी। गाजे-बाजे के साथ गोलबाजार से प्रताप टाकीज चौक होते हुए गोड़पारा रोड से राम-लक्ष्मण अपनी सेना के साथ शनिचरी पड़ाव पहुंचते। वहां प्रतीकात्मक राम-रावण युद्ध के बाद राम पुतले को आग लगा देते।





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