अभिमत. गठबंधन धर्म का निर्वाह करने के फेर में कांग्रेस पार्टी सत्ता की माया और सियासत के भ्रम के बीच झूल रही है। रामसेतु मामले में राम के अस्तित्व को नकारने वाले हलफनामे के ‘पाप’ को धोने के लिए वह जितने भी ‘पुण्य’ के यत्न करती है उसके हमसफर घटक रंग में भंग डाल देते हैं।
दशहरे के दिन प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में जाकर प्रभु श्रीराम के स्वरूप का अभिषेक किया, आरती उतारी तथा रावण को मारने के लिए प्रतीकात्मक रूप से धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई। अखबारों ने पहले पन्ने पर ये नयनाभिराम तस्वीरें प्रकाशित भी कीं।
भला करुणानिधि और उनकी मंडली इसे कैसे बर्दाश्त कर पाती, सो न्यायपालिका तक को न भजने वाले भूतल परिवहन मंत्री टीआर बालू ने दूसरे ही दिन यह कहकर कांग्रेस के पुण्यकर्म में पलीता लगाने की कोशिश की कि सेतुसमुद्रम परियोजना नवंबर 2008 तक पूरी हो जाएगी व वहां से गुजरने वाले पहले जहाज को सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और करुणानिधि हरी झंडी दिखाएंगे।
वाकई कांग्रेस माया और भ्रम के बीच उलझी हुई है। एटमी करार की तरह सेतुसमुद्रम परियोजना को लेकर भी वह एक कदम आगे और दो कदम पीछे चल रही है। कांग्रेस को मालूम है कि यदि लोकसभा के चुनाव होते भी हैं तो भी करुणानिधि का भीतर से व वामदलों का बाहर से समर्थन लेना पड़ सकता है।
खैर, अब गुजरात का चुनाव सामने है और जाहिर है कि सेतुसमुद्रम को लेकर मोदी के जहर बुझे तीर चलेंगे, सो ऐसे में कांग्रेस न तो प्रभु श्रीराम की अर्चना छोड़ सकती है और न ही करुणानिधि की मंडली को सेतुसमुद्रम पर बोलने से रोक सकती है। वैसे अब तो सोनिया गांधी यह समझ ही गई होंगी कि गठबंधन चलाना मेढ़कों को तराजू में तौलने जैसा कठिन काम है और यह साधने से ही आता है।