आलेख. तीज-त्योहार उत्सव मनाने के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं। इस वर्ष हम में से कइयों के पास ऐसा करने का कारण है। कुछ लोगों ने शेयर बाजार के जरिए अपार पैसा बनाया। दूसरे, कई लोगों ने रीयल एस्टेट में धन कूटा। प्रॉपर्टी की कीमतें आसमान छू रही हैं और यहां तक कि झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों ने भी डेवलपर्स से काफी पैसा बनाया। बहरहाल, इस समय लोगों का मूड बहुत अच्छा है। भारत ट्वेंटी२0 वर्ल्ड चैंपियन है।
विश्वनाथन आनंद शतरंज के बेताज बादशाह बन गए हैं। शाहरुख खान ने अपनी नई फिल्म ७५ करोड़ रुपए में बेची है। रतन टाटा एक के बाद एक विदेशी कंपनी खरीद रहे हैं। मुकेश अंबानी दुनिया के सबसे अमीर आदमी बनना चाहते हैं, जबकि उनके भाई अनिल भी धनकुबेरों की सूची में उनसे ज्यादा पीछे नहीं हैं।
रुपया दिन पर दिन मजबूत होता जा रहा है और विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों की काफी आवभगत हो रही है। विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय सपनों की दुनिया में लगातार निवेश कर रहे हैं और वामपंथियों के अड़ंगों के बावजूद अरबों डॉलर यहां आ रहे हैं।
इसी बीच लगता है कि भारत की फिल्में, संगीत, फैशन, खान-पान, योग, कला और आयुर्वेद का दायरा बढ़ता जा रहा है। आईटी और बीपीओ सेक्टर की कंपनियां भी रुपए के अधिमूल्यन के बावजूद बुरा काम नहीं कर रही हैं और बीस अलग क्षेत्रों की कंपनियों के साथ मिलकर इन कंपनियों ने सेंसेक्स को नई ऊंचाइयां दी हैं।
एक साल में दस लाख डॉलर तक कूटने वाले १९000 भारतीयों से हम अचानक उछलकर १00000 तक पहुंच गए हैं। सैंकड़ों नई फ्लाइट्स ने आकाश में ट्रैफिक जाम की स्थिति पैदा कर दी है। चमचमाते नए हवाई अड्डे अस्तित्व में आ रहे हैं। रोज नई-नई कारें सड़कों पर उतर रही हैं। हम रिटेल सेक्टर में अभूतपूर्व उछाल देख रहे हैं।
शॉपिंग मॉल्स, मल्टीप्लेक्स, डिजायनर बंगले इसकी मिसाल हैं। फ्लैटों की कीमत सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। होटल के कमरे का किराया एक लाख रुपए प्रतिदिन तक हो सकता है। इस तरह देखा जाए तो भारत एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है।
यद्यपि इस उछाल का दूसरा पहलू भी है। देश के ११0 करोड़ लोगों में से अस्सी फीसदी अभी भी हर रोज दो डॉलर से भी कम में गुजारा करते हैं। इसका मतलब है कि दुनिया के निर्धनतम लोगों का एक तिहाई हिस्सा हमारे यहां बसता है।
वास्तव में देखा जाए तो हर तीन में से एक भारतीय एक डॉलर से भी कम में गुजारा करता है। भुखमरी और कुपोषण की समस्या आज भी वैसी ही है, जैसी तीन दशक पहले थी। हम इनसे जूझने में अपने हर लक्ष्य में नाकाम रहे हैं। हाशिए पर पड़े समुदायों मसलन अनुसूचित जनजाति तथा मुसलमान इस गरीबी के घाव झेलने को विवश हैं।
यह सब है, बावजूद इसके आप और हम कमरतोड़ टैक्स चुकाते हैं। इस तथ्य के बावजूद कि हम भारतीय दूसरों की तुलना में अधिक तनावपूर्ण परिस्थितियों में ज्यादा देर तक और अपेक्षाकृत कठोर परिश्रम करते हैं। इसके बावजूद कि हमारे यहां सबसे ज्यादा हृदय रोगी, मधुमेह के मरीज, निरक्षर गलियों में भटकते बच्चे और वयस्क हैं।
केवल मुंबई से ही प्रत्यक्ष करों का तकरीबन ७१ फीसदी राजस्व प्राप्त होता है। पिछले महीने तक यह ४२,३00 करोड़ रुपए था। लेकिन हमारे-आपके द्वारा चुकाए गए धन का इस्तेमाल ज्यादा हवाई जहाज, हथियार, टैंक तथा पनडुब्बियों के खरीदने में होता है। यह पैसा अनगिनत ग्रामीण योजनाओं में खपाया जाता है, जिनमें से कोई भी न तो भयावह भीड़-भाड़ वाले शहरों की ओर होने वाले पलायन को रोक सकी है और न ही किसानों की आत्महत्याओं को।
भारतीय परिवार दबाव में बिखर रहे हैं। खेती की जमीन का दायरा छोटा होता जा रहा है, जो ज्यादा लाभकारी नहीं हैं। ‘सेज’ की नई योजनाएं परंपरागत कृषक समुदायों को नुकसान पहुंचा रही हैं। उपभोक्तावाद राष्ट्र के उस नैतिक ताने-बाने को खत्म कर रहा है, जो कभी अपनी आय का २९ फीसदी बचत करता था।
हर कोई नई जीवनशैली को कुछ हद तक अपनाना चाहता है। हम जल्दी ही अमेरिका की तरह हो जाएंगे जहां लोग आज उतना खर्च कर देते हैं, जितना वे अगले तीस साल में कमाएंगे। बस एकमात्र अंतर यही है कि उनके पास स्वास्थ्य सुविधाओं और बुजुर्ग पेंशन का एक सेफ्टी नेटवर्क है, जो हमारे यहां नहीं है।
इसलिए इस उत्सव के बीच हमें कुछ क्षण ठहरकर उन करोड़ों भारतीयों के बारे में भी सोचना चाहिए, जो इन बदलावों से सामंजस्य बिठाने के लिए संघर्षरत हैं और आजकल जो चल रहा है उससे काफी निराश, हताश और डरे हुए हैं। वे इस बात से भयभीत हैं कि यह सब उन्हें कहां ले जाएगा। उनकी खेती खतरे में हैं।
नदियां और झीलें प्रदूषित हो चुकी हैं। जंगल खत्म हो रहे हैं। पीने के पानी के लाले पड़ रहे हैं। घर टूट रहे हैं। उनके बच्चे ऐसे सपनों की आस में शहरों की ओर भाग रहे हैं, जो कभीकभार ही सच होते हैं। हां, वे भी नवीन भारत का हिस्सा बनना चाहते हैं।
सवाल यही है:
क्या वे ऐसा कर सकते हैं?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार हैं।