दृष्टिकोण. मुंबई शेयर बाजार सेंसेक्स दुनिया का सबसे बड़ा सर्कस है। मीडिया की मानें तो इस सर्कस में राष्ट्रीय संपदा में और शेयरधारकों के हर दिन, यहां तक कि हर घंटे लाखों-करोड़ों रुपए घटते या बढ़ते हैं। सेंसेक्स के इस सर्कस की बदौलत मुकेश अंबानी की दौलत लक्ष्मीनिवास मित्तल की दौलत को भी पार कर गई है।
अगर वित्त मंत्री पी चिदंबरम की चलती और सेबी के दामोदरन और रिजर्व बैंक के वायवी रेड्डी दखल नहीं देते, तो साल के शुरू में जो सेंसेक्स 14,000 पर था, वह अब तक 20,000 का आंकड़ा छू चुका होता और राष्ट्रीय संपदा तथा अंबानी भाइयों, केपी सिंह, सुनील मित्तल आदि की निजी संपत्ति के वारे-न्यारे हो रहे होते।
आइए, अब जरा इस दौलत की असलियत भी जान लें। सेंसेक्स में शुमार की जाने वाली 30 बड़ी कंपनियों की कुल संपत्ति संभवत: देश की जीडीपी का एक फीसदी भी नहीं है। यह देश के सुनारों और बढ़इयों द्वारा देश की संपदा में किए जाने वाले योगदान से भी कम है, लेकिन अगस्त में लगाए गए एक अनुमान के अनुसार सेंसेक्स में शुमार 30 कंपनियों की दौलत 18,62 लाख करोड़ रुपए थी, जो देश की जीडीपी के 50 फीसदी से भी ज्यादा है।
यह सेंसेक्स के सर्कस का ही कमाल है कि देश के जीडीपी में एक फीसदी से भी कम योगदान करने वाली कंपनियों की कुल संपदा देश की कुल संपदा के आधे से भी ज्यादा हो। इस सर्कस द्वारा खड़ी की गई संपत्ति खोटी है यह समझने-बूझने के लिए किसी का बहुत ज्ञानी होना जरूरी नहीं है। यह संपत्ति खड़ी करने का तरीका कैसिनो जैसे आधुनिक जुआघरों से ज्यादा अलग नहीं है।
बंबई शेयर बाजार में पार्टिसिपेटरी नोटों (पीएन) और ओवरसीज डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंटों (ओडीआई) ने यह स्थिति पैदा की है। चाहे चिदंबरम हों और चाहे दामोदरन या रेड्डी हो, सभी को पता है कि पीएन और ओडीआर वैध वित्तीय इंस्ट्रूमेंट नहीं हैं। ये तो डायनामाइट के ऐसे गोले हैं जो न केवल बीएसई बल्कि देश तक को तबाह कर सकते हैं। पीएन और ओडीआर तथा बुल और बीयर के अलावा दो अनजाने पशु भी सेंसेक्स के सर्कस में शामिल हैं। ये कैसे पशु हैं?
सेबी ने अधिकृत संस्थागत वित्तीय निवेशकों (फारेन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स-एफआईआई) को भारत के शेयर बाजारों में खरीद-फरोख्त करने की छूट दे रखी है। एफआईआई ऐसी विदेशी कंपनियों से पैसे लेकर पीएन के जरिये भारतीय शेयर बाजारों में निवेश करती हैं जिनके बारे में भारतीय अधिकारियों को कोई जानकारी नहीं होती।
यह दाऊद इब्राहिम की किसी फर्जी कंपनी का भी पैसा हो सकता है जिसे उसके आडिटर संचालित करते हों। दाऊद के आडिटर अपने ग्राहक का नाम उजागर किए बगैर 18 महीने के भीतर पीएन के जरिये खरीदे शेयर बेचकर बाजार से बाहर निकलने के लिए स्वतंत्र हैं। कल्पना तो इससे भी बुरी स्थिति की की जा सकती है।
दाऊद के आडिटर एफआईआई से ओडीआई बनाने को कह सकते हैं और फिर उसे मुंबई धमाकों में उसके सहयोगी रहे टाइगर मेमन या किसी अन्य को बेच सकते हैं। इस सबके बाद भी भारतीय अधिकारियों के लिए वे गुमनाम बने रहेंगे। उनकी कंपनियां वित्तीय कारोबार की दुनिया में बहुत सम्मान के साथ देखे जाने वाले हेज फंडों के जरिये ऑपरेट कर सकती हैं और उनके काले पैसे को सफेद बना सकती हैं।
यह कोई कपोल कल्पना नहीं है। भारत के सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने छह महीने पहले एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कहा था कि आतंकी संगठन बेनामी कंपनियों के जरिये भारत के शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं। रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) ने भी बाद में इसकी पुष्टि की। रॉ ने सऊदी अरब के व्यापारी खालिद बिन महफूज द्वारा पीएन और ओडीआर के जरिये भारतीय शेयर बाजार में निवेश किए जाने के बारे में सरकार को आगाह किया।
महफूज के ओसामा बिन लादेन से संपर्क रहे हैं। इसी के बाद सेबी के प्रमुख दामोदरन ने एक कमेटी बैठाई जो तमाम जांच के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि पीएन और ओडीआर खतरनाक वित्तीय इंस्ट्रूमेंट हैं और इनसे निजात पाई जानी ही चाहिए। हालांकि कमेटी ने इन पर एकबारगी रोक लगाने की बजाय इन्हें क्रमिक रूप से हटाए जाने की सलाह दी।
सेबी ने कमेटी की रिपोर्ट को आधार पर पीएन और ओडीआर के जरिये निवेश पर क्रमश: रोक लगाए जाने के प्रस्ताव वाला डिस्कशन पेपर जारी किया। इसकी खबर फैलते ही 17 अक्टूबर को महज दो मिनट में सेंसेक्स धड़ाम हो गया। इसके फौरन बाद वित्त मंत्री चिदंबरम ने टीवी चैनलों से मुखातिब होकर कहा कि पीएन पर रोक नहीं लगाई जा रही है।
चिदंबरम के बयान के बाद उस दिन सेंसेक्स का गिरना थम गया और उसमें काफी सुधार आ गया। मगर अगले दिन गुमनाम निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर बिकवाली करने से सेंसेक्स फिर लुढ़क गया। आज भारतीय शेयर बाजारों के चढ़ने-उतरने में भारतीय निवेशकों की भूमिका नाम मात्र की रह गई है। यह भूमिका अब विदेशी संस्थागत निवेशकों के हाथों में चली गई है। वे हमारे शेयर बाजार को मन मुताबिक नचा सकते हैं, उठा-गिरा सकते हैं।
हमारे वित्त मंत्रालय को लंबे समय तक इस बात की जरा भी चिंता नहीं रही कि देश के शेयर बाजारों में आ रहा बेशुमार धन वैध है भी कि नहीं। पर अब शायद वित्त मंत्रालय भी महसूस करने लगा है कि दाऊद इब्राहिम और टाइहर मेमन सरीखे लोगों को दलाल स्ट्रीट पर चहलकदमी करने से रोकने के उपाय करने होंगे। ऐसा लगता है कि पूरे सिस्टम ने पीएन और ओडीआर से देश की सुरक्षा के खतरे को अच्छी तरह समझ लिया है। देर आयद दुरुस्त आयद।
-लेखक समसामयिक मामलों के टिप्पणीकार हैं।