सम्पादकीय. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले पखवाड़े मध्यावधि चुनाव की संभावना से इन्कार करके राजनीतिक अनिश्चितता की धुंध छांटने की जो कोशिश की थी, वह एटमी करार पर यूपीए और वाम दलों की समिति की पांचवीं बैठक के बेनतीजा रहने से फिर गहरा गई है।
अंतर इतना भर आया है कि पहले वाम दल आक्रामक मुद्रा अपनाए हुए थे जबकि इस बार प्रधानमंत्री ने सहयोगी दलों को कैबिनेट के सामूहिक फैसले की याद दिलाकर अपने पीछे खड़ा करने और वाम दलों को बैकफुट पर लाने की कोशिश की है। सरकार ने एटमी करार को ठंडे बस्ते में डाले जाने की बाबत वाम दलों को लिखित आश्वासन नहीं देकर भी अपने रवैये में सख्ती लाने का संदेश दिया है।
हालांकि कांग्रेस के आधिकारिक प्रवक्ता ने यूपीए के घटक दलों के नेताओं की बैठक में मनमोहन सिंह द्वारा दिए इस कथित बयान का, कि वाम दलों ने उन्हें नीचा देखने को मजबूर किया है, तुरत-फुरत खंडन भी कर दिया लेकिन सोमवार को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दिनभर चली राजनीतिक बैठकें और दूसरी गतिविधियां कुछ और ही कहानी कहती हैं।
किसी भी खुद्दार प्रधानमंत्री को अपनी सरकार पर ‘मजबूर सरकार’ का लेबल चस्पा किया जाना कतई नहीं सुहाएगा, तो फिर मनमोहन सिंह ही ऐसे लेबल क्यों बर्दाश्त करें। उन्होंने अपनी यह पीड़ा यूपीए के नेताओं के सामने उजागर करके उनसे अपने पीछे खड़ा रहने की अपेक्षा कर कुछ गलत नहीं किया है।
नतीजतन, यूपीए के जो घटक एटमी करार मुद्दे पर सरकार से दूरी बनाने की मुद्रा अपना रहे थे, वे रास्ते पर आ गए और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ भारत संबंधी सुरक्षा मानकों पर बातचीत शुरू करने की वकालत करने लगे। हालांकि वाम दल ऐसी कोई पहल किए जाने के खिलाफ हैं क्योंकि उनकी नजर में ऐसा करने का मतलब एटमी करार पर अमल की प्रक्रिया शुरू करना होगा।
यूपीए और वाम दलों की समिति की अब तक हुई पांचों बैठकों में जो गतिरोध टूट नहीं पाया उसके 16 नवंबर को प्रस्तावित अगली बैठक में टूटने की उम्मीद करना भी बेमानी है। सरकार के कर्णधारों के तौर-तरीकों से लगता है कि वे विपरीत दिशा में बढ़ रही दो नावों में एक साथ सवारी करने की अनगढ़ कोशिश कर रहे हैं।
ऐसा करके मंजिल हासिल करना प्राय: असंभव है। अगर सरकार एटमी करार को देशहित में मानती है तो उसे ऊहापोह से बाहर आना चाहिए और वाम दलों की प्रतिक्रिया से बेफिक्र होकर इस पर अमल की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का साहस दिखाना चाहिए। इस संदर्भ में एटमी करार पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की सरकार की तैयारी स्वागतयोग्य है।