जयपुर. सोमवार को जारी राज्य की औद्योगिक नीति के ड्राफ्ट में जिन समस्याओं पर जोर दिया गया है, उन्हीं पर सात साल पहले आयोजित इंटरनेशनल राजस्थानी कान्क्लेव में शामिल देश के नामी उद्योगपतियों ने भी चर्चा की थी। बजाज ऑटो के चेयरमैन राहुल बजाज ने तब कहा था कि ‘हमसे यहां आने की भीख मत मांगिए, ऐसा वातावरण बनाइए कि हम राजस्थान में उद्योग लगाने के लिए आपसे भीख मांगें।’
बड़े उद्योगों के पक्ष में है यह नीति
राज्य सरकार ने सीआईआई जैसे बड़े संगठन के सहयोग से जो औद्योगिक नीति का प्रारूप बनाया है, वह लघु उद्योगों के लिए खतरे की घंटी है। सरकार बड़े उद्योगपतियों के बारे में ही सोचती है, उसे प्रदेश में फैले कुटीर उद्योगों की परवाह नहीं है। प्रदेश में उद्योग लगाने में ‘थोड़ी’ नहीं बल्कि भारी परेशानी आती है और यह आंकड़ा सर्वे के 62 प्रतिशत से भी अधिक बैठता है।
-विश्वनाथ पोद्दार, सचिव, बगरू इंडस्ट्रियल एरिया, बगरू
अर्थतंत्र बनाए बिना उद्योग के सपने
राज्य सरकार को खनिज, कृषि और औद्योगिक उत्पादों को एक साथ जोड़ना होगा, जिसके बिना उचित अर्थतंत्र के विकास की कल्पना करना भी संभव नहीं है। पॉलिसियां बनाना आसान है, उनपर उचित अमल बहुत मुश्किल है। जब तक राज्य सरकार घोषित नीति के क्रियान्वयन के लिए जबावदेह तंत्र विकसित नहीं कर देती, ऐसे कई झूठे डाक्युमेंट बनते रहेंगे।
- सुभद्र पापड़ीवाल, महासचिव, यूनाइटेड काउंसिल आफ राजस्थान इंडस्ट्रीज (यूकोरी)
बीमार इंडस्ट्रीज की सुध तो ली ही नहीं
औद्योगिक नीति के ड्राफ्ट बनते रहे हैं और आगे भी बनेंगे। सरकार औद्योगिक क्षेत्रों की सुध तो लेती नहीं है। वीकेआई में 500 इकाइयां औद्योगिक रुग्णता की शिकार होकर बंद हो गई हैं। सरकार को चाहिए कि इन्हें फिर से खड़ा होने का मौका दे। पड़ौसी राज्यों के मुकाबले हम अपने तैयार माल की उत्पादन लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं तो फिर प्रतिस्पर्धा में कैसे टिकेंगे।
-ताराचंद चौधरी, अध्यक्ष, विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र, वीकेआई
2000
* विभागीय कामकाज धीमा है। इसमें गति आनी चाहिए।
* राज्य के बारे में सूचनाओं का अभाव है।
* आधारभूत ढांचा उद्योगों के अनुकूल नहीं हैं।
* लघु उद्योगों के लिए विकास के अवसर नहीं।
2007
* सिंगल विंडो सिस्टम के बावजूद नौकरशाही की रुकावटें जारी हैं।
* फैसला करने वाले खुद ही प्रशिक्षित नहीं हैं।
* औद्योगिक इकाइयों की गांवों से कनेक्टिविटी नहीं।
* लघु उद्योगों को पड़ोसी राज्यों के मुकाबले रियायतें कम।
बीमार लघु उद्योगों की सुध कौन लेगा?
राज्य के औद्योगिक विकास की रीढ़ हैं लघु उद्योग लेकिन जब भी कोई नीति बनती है तो उसमें सिर्फ बड़े उद्योगों को आकर्षित करने का उद्देश्य ही शामिल होता है। आज प्रदेश के 100 से अधिक औद्योगिक क्षेत्रों में बीमार इकाइयों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। एक आकलन के अनुसार हर औद्योगिक क्षेत्र में 30 से 35 प्रश तक इकाइयां सरकारी उपेक्षा से बंद होने की स्थिति में हैं।
पिछले एक दशक में दो राज्य सरकारें आ चुकी हैं लेकिन उद्योग जगत की इससे ज्यादा उपेक्षा क्या होगी कि उद्योग नीति अपना स्वरूप तक तय नहीं पाई। भूमंडलीकरण के दौर में लघु उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की बड़ी कंपनियों से मुकाबला करना पड़ रहा है। ऐसे में उन्हें कम लागत पर उच्च गुणवत्ता के उत्पाद बनाने का काम करना होता है जो बिना सरकारी मदद के संभव नहीं है। चार साल पहले निवेश प्रोत्साहन नीति जारी की गइ लेकिन वह व्यावहारिक ही नहीं थी। लघु उद्योगों को विकसित करने के लिए कलस्टर योजना बनाना जरूरी है। लघु उद्योगों से सरकारी खरीद को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कार्यशील पूंजी के बिना ये उद्योग अपना वजूद कायम नहीं रख सकते हैं।
‘रिसर्जेंट नहीं डिटर्जेट’ अभियान चलाया जाए
राज्य में उद्योग लगाने में कई बाधाएं हैं। गुर्जर आंदोलन से औद्योगिक विकास कई कदम पीछे चला गया है। अगले माह होने वाले ‘रिसर्ज्ेट राजस्थान’ में बड़े निवेश की अटकलें लगाई जा रही हैं। मेरी राय में औद्योगिक विकास की राह में रुकावटें बन रहीं तमाम समस्याओं की कालिख धोने के लिए ‘डिटरजेंट राजस्थान’ अभियान चलाया जाना चाहिए।
सीआईआई और यस बैंक की ओर से औद्योगिक नीति के प्रारूप के लिए किए गए सर्वे में तो सिर्फ 62 प्रतिशत ने यहां उद्योग लगाना थोड़ा मुश्किल माना है जबकि मेरी राय में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत से कम नहीं हो सकता है।
बाहर से आने वाले नए उद्योगों को बढ़ावा देना अच्छी बात है लेकिन इसे स्थानीय उद्योगों का उत्साह भंग करके नहीं किया जाना चाहिए। सात साल पहले एक आयोजन जयपुर में हुआ था जिसे इंटरनेशनल राजस्थानी कान्क्लेव नाम दिया गया था। इसमें बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों ने भाग लिया और भविष्य में पूंजी निवेश के बड़े वायदे भी किए लेकिन असलियत में हुआ कुछ नहीं।
निवेश के वादे करना और असलियत में आकर उद्योग लगाने में बड़ा फर्क है। ज्यादा दूर मत जाइए, राजधानी जयपुर में काम कर रहे औद्योगिक क्षेत्रों की स्थिति का यदि आप जायजा लेंगे तो आप पाएंगे कि सरकारी उपेक्षा, करों के बोझ और प्रोत्साहन के अभाव में किस प्रकार स्थानीय उद्योग दम तोड़ रहे हैं।
औद्योगिक क्षेत्रों को प्रदेश के हर जिले में विकसित तो कर दिया गया लेकिन उन्हें नई तकनीक के साथ बिना करों के बोझ के फलने-फूलने का अवसर नहीं दिया गया है। सब्सिडी और इन्सेंटिव के दम पर लगाई गई नई इंडस्ट्री कई सालों से काम कर रही पुरानी इंडस्ट्री को लाभ के मोर्चे पर आसानी से पीछे छोड़ सकती है।