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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. लमनी के जंगल में सन 2003-04 तक आसानी से दिखाई देने वाला माउस डियर (चूहे के आकार का हिरण) आज लगभग विलुप्त हो गया है। इसकी खोज करने वन विभाग ने एक अभियान चलाने का निर्णय लिया है।
इसी तरह औंरापानी क्षेत्र में हजारों की संख्या में पाए जाने वाले गिद्ध व अचानकमार रेंज के बड़ी गिलहरी को संरक्षित करने की योजना बनाई गई है। इसके लिए राज्य के माध्यम से केंद्र शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा।
यदि कोई कहे कि हिरण भी खरगोश के आकार का हो सकता है तो एकबारगी इस बात पर विश्वास नहीं होगा, लेकिन यह सच है। लमनी व अचानकमार के जंगल में माउस डियर पाए जाते थे, जिन्हें वन अधिकारियों ने सन 2003-04 तक भी देखा है।
इसके बाद वे विलुप्त होने लगे। वन विभाग ने विलुप्त हो चुके इस वन्यजीव को एक बार फिर खोजकर संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया है। इसके लिए शासन की मदद ली जाएगी।
अनुकूल रहवास व भोजन की कमी के चलते दुर्लभ में गिना जाने वाला गिद्ध औंरापानी के जंगल में हजारों की संख्या में है। इसे संरक्षित किया गया तो इसके वंश को बढ़ाया जा सकता है।
इसी तरह दुर्लभ बड़ी गिलहरी भी अचानकमार रेंज में पर्याप्त संख्या में है। वन विभाग द्वारा इन्हें संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए भी सरकार से मार्गदर्शन व आर्थिक मदद के लिए प्रस्ताव भेजा जाएगा।
कैसे देंगे संरक्षण?
गिद्ध व उड़न गिलहरी के संबंध में वन्यप्राणी विशेषज्ञों से सलाह लेते हुए उनके संबंध में जानकारी एकत्र की जाएगी। उन्हें भोजन, रहवास एवं हर तरह से अनकूल वातावरण दिया जाएगा, ताकि उनकी घटती संख्या पर विराम लगे साथ ही वे अपनी वंशवृद्धि कर सकें।
चीतल शिफ्ंिटग के लिए सरकार ने दिए 3 लाख
राज्य शासन ने कानन पेंडारी से अचानकमार में चीतलों की शिफ्ंिटग के लिए वन विभाग को 3 लाख रुपए की आर्थिक मदद की है। विभाग ने शिफ्ंिटग के दौरान इतनी ही राशि की मांग सरकार से की थी। शिफ्ंिटग की सफलता को ध्यान में रखकर सरकार ने इसमें कोई कटौती नहीं की है।
राज्य सरकार से आर्थिक मदद मिलते ही वन विभाग ने चीतलों की शिफ्ंिटग की तैयारी शुरू कर दी है। विभाग को दो सौ चीतलों की शिफ्ंिटग के लिए केंद्रीय जू प्राधिकरण नई दिल्ली से पहले ही अनुमति मिल चुकी है। डीएफओ एसडी बड़गैयां ने बताया कि शिफ्टिंग के लिए नवंबर माह उपयुक्त रहेगा, क्योंकि इस समय ठंड शुरू हो जाएगी।
चीतलों को बेहोशी के लिए खिलाई जाने वाली दवा डाइजीपाम गरम तासीर की होती है, जिससे ठंड में ही शिफ्ंिटग करना बेहतर होगा। उन्होंने बताया कि इस बार बाड़े के बाहर घूम रहे चीतलों को शिफ्ट किया जाएगा, ताकि किसानों की फसल को भी नुकसान होने से बचाया जा सके।
निर्णय लेकर भूला वन विभाग:
चीतलों की शिफ्ंिटग के दौरान करीब 20 प्रतिशत चीतलों की मौत सामान्य मानी जाती है। कानन पेंडारी से पांच चरणों में 157 चीतलों की शिफ्ंिटग की गई थी, जिसमें केवल 8 चीतलों की मौत हुई थी। विभाग ने इस सफलता पर कानन पेंडारी प्रभारी एएस नाथ का सम्मान करने का निर्णय लिया था, लेकिन अभी तक इसे अमल में नहीं लाया जा सका है।
रखनी होगी विशेष सावधानी
पिछली बार शिफ्ंिटग के दौरान चीतलों को बेहाशी के लिए चने के साथ डाइजीपाम का ओवरडोज दे दिया गया था। इसके चलते कुछ चीतलों की अचानकमार में मौत भी हो गई थी। शिफ्ंिटग में इसका ध्यान रखना होगा।