News
Metros
Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़. पीयू के स्टूडेंट्स काउसिल चुनावों में स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन के लिए रिसर्च स्कॉलर्स की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। इन चुनावों में पीयू के रिसर्च स्कॉलर अहम भूमिका निभाने जा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पीयू के रिसर्च स्कॉलर न सिर्फ इस बार स्टूडेंट्स काउंसिल चुनावों में वोट डाल सकेंगे, बल्कि उन्हें चुनावों में भाग्य आजमाने का भी मौका मिलने जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लागू की
गईं जेएम लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक किसी भी यूनिवर्सिटी में होने वाले स्टूडेंट्स काउंसिल चुनावों में रिसर्च स्कॉलर्स को वोटिंग राइट देने के साथ ही प्रत्याशी के तौर पर खड़े होने का भी अधिकार दिया गया है।
इस बार जेएम लिंगदोह कमेटी की लागू हुई सिफारिशों के बाद पीयू के करीब 900 रिसर्च स्कॉलर वोट डालकर छात्र संगठनों के चुनावी समीकरण बनाने-बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं, बल्कि इन रिसर्च स्कॉलर्स के पास प्रत्याशियों की चुनावी जीत तय करने की भी चाबी होगी।
रिसर्च स्कॉलर्स की इस ताकत को स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशंस भी बखूबी समझ रही हैं। सोपू के कैम्पस प्रेजिडेंट रिसर्च स्कॉलर्स को मिले इस अधिकार के फैसले को सही मानते हैं तो पुसू कैम्पस प्रेजिडेंट अभिषेक पुरी भी रिसर्च स्कॉलर्स को यह अधिकार मिलने को सही करार देते हैं।
न के बराबर थी भूमिका
अभी तक पीयू के स्टूडेंट्स काउंसिल चुनावों में अच्छी-खासी तादाद होने के बाद भी रिसर्च स्कॉलर्स की भूमिका न के बराबर थी। हालांकि पीयू में हर साल 40 से 50 फीसदी ऐसे स्टूडेंट्स वोटिंग कर रहे हैं, जो प्लस स्टू के बाद ही यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेते हैं।
इनमें यूआईईई, कैमिकल इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, फाइव ईयर लॉ कोर्स जैसे कई दूसरे डिपार्टमेंट्स के स्टूडेंट प्लस टू के बाद ही वोट डालते आए हैं। दूसरी तरफ पीयू में वैचारिक तौर पर मैच्योर कही जाने वाली रिसर्च स्कॉलर्स की बड़ी संख्या को चुनावों से दूर रखा गया है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।