मुंबई. यह नज़्म सिर्फ एक नज़्म नहीं बल्कि एक दस्तावेज है कि हिंदोस्तान के हालात आज़ादी के तुरंत बाद क्या थे और आज़ादी के बाद मकसद के तौर पर हिंदोस्तान ने किन सपनों का ताना-बाना बुना था। अवाम की मुश्किलें क्या थीं, ख़्वाहिशें क्या थीं, बच्चों, औरतों, बूढ़ों, जवानों के हालात क्या थे और उनकी मांग क्या थी। कुल मिलाकर गांधी के सपनों का भारत कैसा हो, इस विजन को एक मायूसी के संगीत के साथ लेकर चलती इस नज़्म से पचास के दशक के भारत के बारे में बहुत सी सच्चाइयां समझी जा सकती हैं।
इस नज़्म का पूरा ख़याल एक बेहतर कल की तस्वीर है लेकिन इसकी खूबी अगर देखी जाए तो वह यह है कि आज के बुरे दिनों की मायूसी, अच्छे कल की उम्मीद लेकिन साथ में एक कंपकंपाती हुई आवाज़ कि कहीं यह बहुत बड़ा ख़्वाब तो नहीं और लगातार एक उदासी फिर भी नज़रिया सकारात्मक।
इतना कुछ एक साथ.. वाक़ई जब ख़य्याम साहब ने इसकी धुन बनाई होगी तो कितना कुछ एहतियात बरता होगा और शायद इसलिए तभी वाद्य यंत्रों का प्रयोग इस नज़्म में बहुत कम किया गया। हल्के से संगीत के साथ मुकेश साहब की दर्द भरी, गहरे चीरती हुई आवाज को उभारा गया। यह नज़्म रमेश सैगल की फिल्म फिर सुबह होगी में ली गई थी। फिल्म फ्योदोर दोस्तोव्स्की के उपन्यास क्राइम एंड पनिशमेंट पर आधारित थे और मुख्य चरित्र निभाया था राज कपूर ने।
नज़्म
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग़मे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..
जिस सुबह की खतिर जुग-जुग से हम सब मर-मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी-प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की कीमत कुछ भी नहीं
इंसानों की इज़्ज़त जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा
चाहत को न कुचला जाएगा इज़्ज़त को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..
बीतेंगे कभी तो दिन आखिर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा
हक मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..
फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसान न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोजख़ में अरमान न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..
जिस सुबह की खतिर जुग-जुग से हम सब मर-मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
वो सुबह न आए आज मगर वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी..