मुंबई. साहिर को मूलरूप से यथार्थपरक शायर माना जाता है। तरक्कीपसंद तहरीक या प्रगतिशील आंदोलन के प्रमुख कवियों में उनका शुमार है। और, शायरी में ग़ालिब और इक़बाल के बाद चिंतन-विचार देने वाले वे प्रमुख शायर हैं। इस मामले में उनके समकालीन फ़ैज़ के साथ उनकी तुलना भी की जाती है। इस नज़्म में समय की दुश्वारियों के साथ ही उस सोची-समझी साज़िश का संकेत भी है जो इंसान को मानसिक रूप से अपाहिज करती है।
अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, बेकारी जैसी समस्याएं उस समय हिंदोस्तान में थीं और योजनाओं के नाम पर सिर्फ सपने थे और वो भी आम आदमी की पहुंच से दूर ही दिखते थे। फिर यह भी कहा गया कि ‘हमारी शिक्षा पद्धति सिर्फ क्लर्क पैदा करती है’। कुल-मिलाकर पूंजीपति विकास कर रहे थे और गरीब घिसटते-घिसटते रेंगने की स्थिति में पहुंचकर अपनी तरक्की महसूस कर रहा था। इस साज़िश का पर्दाफ़ाश साहिर की इस नज़्म में होता है। हालात आज कुछ बेहतर हैं लेकिन अंदरूनी स्तर पर सच्चई अब भी यही है कि पूंजी का वितरण ठीक नहीं है। अमीरी-गरीबी की कई परतें बन रही हैं।
साहिर ने इस नज़्म में चेतावनी दी है कि इस दौर की यह साज़िश कहीं अपाहिज इस कदर न कर दे कि ‘ताउम्र फिर कोई हसीं ख़्वाब न बुन सकें..’ इसलिए उन्होंने बेहतर कल के लिए एक ख़्वाब यानी एक योजना, एक विजन बनाने की सलाह दी है।
नज़्म
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जानो-दिल को कुछ ऐसे कि जानो-दिल
ताउम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें..
गो हमसे भागती रही ये तेज़गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र
जुल्फों के ख़्वाब होंठों के ख़्वाब और बदन के ख़्वाब
मेराजे-फ़न के ख़्वाब कमाल-सुखन के ख़्वाब
तहज़ीबे-ज़िंदगी के फ़रोग़े-वतन के ख़्वाब
ज़िंदां के ख़्वाब कूचा-ए-दारो-रसन के ख़्वाब
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बेरंग है हयात
यूं है कि जैसे दस्ते-तहे-संग है हयात
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जानो-दिल को कुछ ऐसे कि जानो-दिल
ताउम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें..