मुंबई. यह है साहिर की वह नज़्म जिसे उनकी शायरी का इकबालिया बयान कहा जा सकता है। तऱक्क़ी पसंद होने का ठप्पा लगा देने भर से काम नहीं चलता या सिर्फ इस एक ठप्पे से किसी शायर की शायरी का अंदाज़ नहीं लगाया जा सकता जैसा कि लोग अमूमन करते हैं कि ‘..अच्छा वह उस विचारधारा का शायर है..’। ज़रूरी होता है कि आप उसकी शायरी के पीछे के पूरी परतों को देखें तब कोई राय कायम करें और यह भी तय है कि एक अच्छा शायर अपनी ज़िंदगी में अगर दस बेहतरीन क़लाम भी दे पाए तो वह कामयाब हो जाता है, हो सकता है।
बहरहाल, इस नज़्म में साहिर ने पाठकों, आलोचकों को जवाब देते हुए लिखा है कि वे क्यों हुस्न, जाम, खु़दा या महबूब के आग़ोश में लिपटी रहने वाली शायरी से कतराते हैं। क्यों सुनहरे और हक़ीक़त से दूर के ख़्वाबों पर शायरी करने का उनका मक़सद नहीं है। यह एक सोच थी तऱक्क़ी पसंद तहरीक़ की लेकिन अब यह सोच जाती रही है और अब प्रगतिशीलता के नाम पर जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसमें से अधिकांश या तो विशेष हितों से प्रेरित है या कूड़े-कबाड़े में फेंकने के लिए।
यह नज़्म उस दौर की उस शायरी की पहचान है जिसकी बुनियाद में नेक मक़सद रखे गए थे और इमारत भी पूरी लगन के साथ खड़ी की गई थी। उस दौर में प्रगतिशील कविता/शायरी ने धूम मचाई थी। इस नज़्म को पढ़कर वाक़ई उस जज़्बे को समझने का मौका मिलता है..
नज़्म
मेरे सरक़श तराने सुनके दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़मों से नफ़रत है
मुझे हंगामा-ए-जंगो-जदल में क़ैफ़ मिलता है
मेरी फ़ितरत को ख़ूंरेज़ी के अफ़सानों से रग़बत है..
मेरी दुनिया में कुछ वक़अत नहीं है ऱक्सो-नग़मे की
मेरा मेहबूब नग़मा शोरो-आहंगे-बग़ावत है
मगर ऐ काश! देखें वो मेरी पुरसोज़ रातों को
मैं जब तारों पे नज़रें गाड़कर आंसू बहाता हूं
तसव्वुर बनके भूली वारदातें याद आती हैं
तो सोज़ो-दर्द की शिद्दत से पहरों तिलमिलाता हूं
कोई ख़्वाबों में ख़्वाबिंदा उमंगों को जगाती है
तो अपनी ज़िंदगी को मौत के पहलू में पाता हूं
मैं शायर हूं मुझे फ़ितरत के नज़्ज़ारों से उल्फ़त है
मेरा दिल दुश्मने-नग़मा-सराई हो नहीं सकता
मुझे इंसानियत का दर्द भी बख़्शा है कुदरत ने
मेरा मक़सद फ़क़त शोला-नवाई हो नहीं सकता
जवां हूं मैं जवानी लग़्ज़िशों का एक तूफ़ां है
मेरी बातों में रंगे-पारसाई हो नहीं सकता
मेरे सरक़श तरानों की हक़ीक़त है तो इतनी है
कि मैं जब देखता हूं भूख के मारे किसानों को
गरीबों मुफ़लिसों को बेक़सों को बेसहारों को
सिसकती नाजनीनों को तड़पते नौजवानों को
हुक़ूमत के तशद्दुद को अमारत के तक़ब्बुर को
किसी के चीथड़ों को और शहंशाही ख़ज़ानों को
तो दिल ताबे-निशाते-बज़्मे-इशरत ला नहीं सकता
मैं चाहूं भी तो ख़्वाब-आवार तराने गा नहीं सकता..